भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

( २ ) इस व्योग-साधन से उसके हृदय में सदगुणों का आविर्भाव होता है।

( ३ ) प्राप्त दिव्य गुणों के प्रभाव से, वह ऊपर के दोनों उच्च उद्देश्यों को प्राप्त करने में दृढ़ हो जाता है।

( ४ ) और इस प्रकार वह योग्य बनकर अच्छी योग्यता से अपने आचार्य को पूर्ण-काम करता है।

ब्रह्मचारी ऐहिक और पारलौकिक सुखों को साधने वाली विद्या का भली भाँति अध्ययन करता है। ज्यों ज्यों अध्ययन करता है, त्यों त्यों उसके हृदय में उत्तम ज्ञान प्राप्त होता है। कुछ समय के अनन्तर, वह विद्वान् बन जाता है, और वह अपने आचार्य के निरन्तर के परिश्रम को भी इस प्रकार सफल करता है।

( २ )

ब्रह्मचारिणं पितरौ देवजनाः

पुण्यदेवा अनुसंयन्ति सर्वै ।

गन्धर्वा एनमन्वायन् वयर्हिश्वत् त्रिशताः ।

पट्सहस्राः सर्वान्तस् देवास्तपसा पिपलि ॥

( १ ) ब्रह्मचारी को पितर, देवजन, अन्य देव और गन्धर्व, सभी लोग अनुसरते हैं। ( २ ) वह अपने तप से ३०, ३०० और ६००० देवों को परिपूर्ण करता है।

( १ ) ब्रह्मचारी के पिता-पितामहदि, झुमैपै पुरवासी तथा गुणशाली लोग, सभी उसका कल्याण चाहते हैं।

( २ ) और वह अपने अनुष्ठान से सर्वज्ञ की दिव्य शक्तियों को विकसित करता है।

ब्रह्मचारी के सभी हितैषी (चाहने वाले) उसकी आशा लगाने