ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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रहते हैं कि वह अपने व्रत से विचलित न होने पावे । जब उसका ब्रह्मचर्य पूर्ण हो जाता है, और वह विद्या पढ़ लेता है, तब उसका मानसिक और शारीरिक विकास होता है ।
इस मन्त्र में जो देवों की संख्या गिनाई गई है । उसका अभिप्राय यह है कि इस शरीर में भी सब देवों के अंश हैं । एक भी अङ्ग ऐसा नहीं, जिसमें कि एक न एक प्रकार की दैवी ( प्राकृतिक ) शक्ति न हो । चन्द्रों के आधार पर भव्य जीवित रहता है । चन्द्रों तीन, तीस, तीन सौ और छः सहस्र—गुण, धर्म, योग्यता और विषय के मूल को देव नाम से अभिहित किया ।
( ३ )
आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणं कृणुते गर्भमन्त्रः । तं रात्रौ त्विस्त्वं उदरे विमर्शितं तं जातं द्रष्टुम मिसंन्यस्त देवाः ॥
(१) ब्रह्मचारी को प्राप्त करने वाला आचार्य, उसे अन्तर्गत करता है (२) उसे तीन रात तक अपने उदर में रखता है और (३) उसके उत्पन्न होने पर देव-गण उसे देखने आते हैं ।
(१) आचार्य अपने यहाँ आये हुये ब्रह्मचारी को अपने अधिकार में कर लेता है । वह विना आचार्य की आज्ञा, कुछ भी नहीं कर सकता । अर्थात् ब्रह्मचारी से आज्ञा-पालन करवना है ।
(२) जब तक उस ब्रह्मचारी के त्रिविध अद्यान दूर नहीं हो जाते, तब तक वह उसे अपने संरक्षण में रखता है ।
(३) जब वह सुबोध हो जाता है—उसकी बुद्धि परिपक्व हो जाती है, तब आचार्य उसे अपने वन्यन से मुक्त कर देता है । फिर विद्वान् लोग उसका आदर-सत्कार करते हैं ।
उपनयन-संस्कार के हो जाने पर, ब्रह्मचारी अपने आचार्य के