भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 86, कुल 380 में से

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

सन्निकट जा कर उससे विद्या पहने की प्रार्थना करता है। वह आचार्य उस ब्रह्मचारी को अपने आश्रम में रहने, तथा निरन्तर अध्ययन करने की आज्ञा देता है। वह उसे क्रमशः आधि-भौतिक, आधिदैविक और अध्यात्मिक—इन तीन दुःखों से बचने के लिये ज्ञानोपदेश करता है। जब वह समझ लेता है कि अब यह ब्रह्मचारी सुयोग्य और परिपक्व-बुद्धि हो गया, तब वह उसे स्वतन्त्र कर देता है। अर्थात् घर जाने की आज्ञा देता है, इस बात से उस ब्रह्मचारी की हित-कामना करने वाले लोग, उससे मिल कर प्रसन्न होते हैं।

( ४ )

इयं समितृष्टिवी-चौर्द्वितीये तान्तरिजं समिधा प्रणति ।

ब्रह्मचारी समिधा मेखलाया अमेण लोकास्तपसाविपत्ति ॥

(१) यह पृथिवी पहली समिधा है। (२) दूसरी समिधा आकाश है, जिससे वह अन्तरिज को प्रसन्न करता है और (३) ब्रह्मचारी समिधा, मेखला, श्रम और तप से लोक को पूर्ण करता है।

(१) पहली 'परा विद्या' है, जिससे भौतिक वस्तुओं का बोध होता है।

(२) दूसरी 'अपरा विद्या' है जिससे अध्यात्मिक अनुभव किया जाता है और जिसके प्राप्त होने पर आत्मानन्द प्राप्त होता है।

(३) और ब्रह्मचारी अपनी विद्या, कटिबद्धता, परिश्रम तथा अनुष्ठान से लोगों को रस करता है।

ब्रह्मचारी अपने आचार्य से भौतिक और अध्यात्मिक विद्यायें सीखता है। अध्यात्मिक ज्ञान हो जाने से उसका आत्मा सन्तुष्ट हो

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