भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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जाता है। तत्पश्चात् वह अपने आचार्य से विलग हो कर अपनी विद्या; कठिबद्धता, परिश्रम और अध्यवसाय से समाज-सेवा में लग जाता है। यहीं से उसका सामाजिक जीवन प्रारम्भ होता है।

( ५ )

पूर्वी जाती ब्रह्मयो ब्रह्मचारी, धर्म वस्तान्तपसो दतिष्ठत् । तस्माज्जातं ब्राह्मणं ब्रह्मज्येष्ठं । देवाश्च सर्वे श्रमतेन साकम् ॥

( १ ) ब्रह्म के पहले ब्रह्मचारी होता है। ( २ ) उन्मूला के साथ तप से ऊपर उठता है। ( ३ ) उससे ज्येष्ठ ब्रह्म उत्पन्न होता है और ( ४ ) सब देव अमृत के साथ रहते हैं।

( १ ) ब्रह्मचारी ज्ञान-प्राप्ति के पहले से ब्रह्मचर्य का पालन करता है।

( २ ) वह अपने ब्रह्मतेज के प्रताप से उन्नति करता है।

( ३ ) ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन से ही उसे श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त होता है।

( ४ ) और परमोत्तम ज्ञान के होने पर, उसके सभी दिव्य गुण, सुख के साधन बन जाते हैं।

ब्रह्मचारी जब तक विद्याध्ययन न करले, तब तक ब्रह्मचर्य (वीर्य-रक्षण) का यथावत पालन करे। विद्या से ब्रह्मतेज और इस तेज के कारण ही, उसे आत्म-विकास हो प्राप्त सकता है। क्योंकि जिसका आत्मा विकसित होता है, वही पुरुष धार्मिक दृष्टि से श्रेष्ठ ज्ञान का अधिकारी है। जो ज्ञानी होता है, उसके सद-गुण उसे निश्चय ही मोच प्राप्त करा देते हैं।