ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 380 में से
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[अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त]
( ६ )
ब्रह्मचार्येतिसमिधा समिद्धाः कर्णवसानो दौक्षितो दीर्घश्रमश्रुः । ससद्यपति पूर्वंस्माहुत्तरं समुद्रं, लोकान्स्नग्भ्य मुहुर्नारचक्रित् ॥
( १ ) ब्रह्मचारी समिधा से दिग्भूषित, कृष्ण हरिण-चर्म पहनता हुआ और दीर्घ श्रमश्रु को धारण करता हुआ आगे बढ़ता है । ( २ ) वह पूर्व से उत्तर समुद्र तक शीघ्र पहुँचता है और ( ३ ) लोक-संमूह कर के वार-वार उल्लेजित करता है ।
( १ ) ब्रह्मचारी अपने को विद्या से उन्नत करता है । वह काले हरिण का चर्म पहनता है; और मूछदाढ़ी को बढ़ने देता है । वह प्रगति करने के लिये नेष्ठित रहता है ।
( २ ) इस प्रकार वह विद्या का साङ्गोपाङ्ग अध्ययन कर, ज्ञानरूपी समुद्र के आदि से अन्त तक पहुँचता है ।
( ३ ) और संसार के साथ सद्व्यवहार कर, उसे सत्कर्म के लिये उत्साहित करता है ।
ब्रह्मचारी पहले विद्याध्ययन से अपनी उन्नति करता है । काले रंग के भुगुचर्म और बड़े-बड़े केश आदि के धारण करने से उसकी पवित्रता, सरलता और निरभिमानता सूचित होती है । अर्थात् वह शुद्ध और साधु-वैप में रहता है । वह अपनी प्रगति पर विशेष ध्यान देता है । इसी से वह थोड़े ही समय में वेद—वेदाङ्गों के ज्ञान में पारङ्गत हो जाता है । इसके अनन्तर वह कार्यक्षेत्र में पदार्पण करता है । यहाँ वह अपने अनुपम उपदेशों से लोगों में एकता उत्पन्न करता है, और उन्हें सत्कर्म करने के लिये वार-वार उत्साहित करता रहता है । अर्थात् जनता को सुसंस्कृत करना ही उसका ध्येय होता है ।