भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विद्यान

८६

( ७ )

ब्रह्मचारी जन्यब्रह्मापो लोकं प्रजापतिं परमेश्विन्नं विराजम् । गर्भोभूत्वाऽभूतस्य योनाचिन्द्रोह भूत्वाऽसुरां स्ततहं ॥

ब्रह्मचारी लोक, प्रजापति और तेजस्वी परमेश्वर को उत्पन्न करता हुआ, अत्युत्तम के गर्भ में रहकर, इन्द्र हो कर, मिथुन पूर्वक असुरों का नाश करता है ।

जो ब्रह्मचारी प्रजा, राजा और परमात्मा को तुष्ट करने के लिये, सत्कर्म कर रहा था, वही अब ज्ञान के गुरु विषयों से परिपूर्ण हो कर—विद्यानों में श्रेष्ठ बन कर—दुर्गुणों का नाश करता है । अर्थात् संसार को उपदेश देता है ।

ब्रह्मचारी प्रजा, राजा और ईश्वर को प्रसन्न रखने के लिये ब्रह्मचर्य-पूर्वक विद्या का अध्ययन करता है । इससे सत्कर्म का जन्म-दाता है । क्योंकि इस संसार में राजा, प्रजा और ईश्वर—इन्हीं तीनों के प्रति ही सभी कर्तव्य होते हैं । जब वह विद्या से पूर्ण हो जाता है, तब सुखमय गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर देश, जाति और समाज की योग्य सेवा करता है । वह अपने उत्तम विचारों का प्रचार कर, लोगों के कुसंस्कारों और दुर्गुणों का नाश करता है ।

( ८ )

आचार्यस्ततन्नभस्ती उभे इमे उर्ध्वी गम्भीरो पृथिवीं दिवञ्च । ते रक्षति तपसा ब्रह्मचारी, तस्मिन्देशा सम्मनसो भवन्ति ॥

( १ ) आचार्य बड़े गम्भीर दोनों लोकों—पृथिवी और आकाश को बनाता है । ( २ ) ब्रह्मचारी अपने दप से उनकी