ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
रक्षा करता है । और ( ३ ) देव लोग उसके मन के साथ रहते हैं ।
( १ ) आचार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण 'भौतिक और अध्यात्मिक' ज्ञान का उपदेश करता है ।
( २ ) ब्रह्मचारी उनको अपने अनुष्ठित व्रत के साथ हृदय-क्षम करता जाता है ।
( ३ ) और इस प्रकार उसके (ब्रह्मचारी) सभी दिव्य गुण विकसित होते हैं ।
आचार्य ही भौतिक और अध्यात्मिक ज्ञान का कर्ता है । जब वह अपने शिष्य को परिषद बना देता है, तब वह भी उसी की भाँति अपनी प्राप्त विद्या की रक्षा करता है । आचार्य जो कुछ उस (ब्रह्मचारी) को सिखाता है, वह उसे भूलने नहीं देता । ब्रह्मचर्य के प्रतार से उसकी विद्या रक्षित रहती है, समयानुकूल बढ़ती भी जाती है । इसलिये उसके दिव्य गुण सारे संसार में विख्यात होते हैं ।
( ६ )
इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी विज्ञामाजभास प्रथमो दिवक्ष्च । ते कृत्वा समिधा वृषास्ते तयोर्पार्वता भुवनानि विश्वा ॥
( १ ) पहले ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि और आकाश की विद्या ग्रहण की । ( २ ) अब उनको दो समिधायें बनाकर, उपासना करता है । और ( ३ ) इन्हीं के बीच में सब भुवनों की स्थिति है ।
( ४ ) ब्रह्मचारी प्रथमतः भौतिक और आध्यात्मिक विषयों की विद्या प्राप्त करता है ।