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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

रक्षा करता है । और ( ३ ) देव लोग उसके मन के साथ रहते हैं ।

( १ ) आचार्य अत्यन्त महत्वपूर्ण 'भौतिक और अध्यात्मिक' ज्ञान का उपदेश करता है ।

( २ ) ब्रह्मचारी उनको अपने अनुष्ठित व्रत के साथ हृदय-क्षम करता जाता है ।

( ३ ) और इस प्रकार उसके (ब्रह्मचारी) सभी दिव्य गुण विकसित होते हैं ।

आचार्य ही भौतिक और अध्यात्मिक ज्ञान का कर्ता है । जब वह अपने शिष्य को परिषद बना देता है, तब वह भी उसी की भाँति अपनी प्राप्त विद्या की रक्षा करता है । आचार्य जो कुछ उस (ब्रह्मचारी) को सिखाता है, वह उसे भूलने नहीं देता । ब्रह्मचर्य के प्रतार से उसकी विद्या रक्षित रहती है, समयानुकूल बढ़ती भी जाती है । इसलिये उसके दिव्य गुण सारे संसार में विख्यात होते हैं ।

( ६ )

इमां भूमिं पृथिवीं ब्रह्मचारी विज्ञामाजभास प्रथमो दिवक्ष्च । ते कृत्वा समिधा वृषास्ते तयोर्पार्वता भुवनानि विश्वा ॥

( १ ) पहले ब्रह्मचारी ने इस विस्तृत भूमि और आकाश की विद्या ग्रहण की । ( २ ) अब उनको दो समिधायें बनाकर, उपासना करता है । और ( ३ ) इन्हीं के बीच में सब भुवनों की स्थिति है ।

( ४ ) ब्रह्मचारी प्रथमतः भौतिक और आध्यात्मिक विषयों की विद्या प्राप्त करता है ।

ब्रह्मचर्य-विद्यान

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( २ ) फिर उन परा और अपरा विद्याओं का भजन करता है । जिन्हें आचार्य उसे देता है ।

( ३ ) और इन्हीं दोनों के बीच में सब कुछ भरा पड़ा है । ब्रह्मचारी अपने आचार्य से भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान का भिन्ना लेता है । 'यिद्विक और पारलौकिक' विद्या की प्राप्ति से उसका उद्देश्य सिद्ध हो जाता है । इस यज्ञ के पूर्ण हो जाने पर फिर उसके सारे मनोरथ स्वयं सपते हैं । यही उसकी भिन्ना का आदर्श है ।

( १० )

अर्वागन्यः परोअन्यो दिवस्पृष्टादृगृहानिधी निहितो ब्राह्मणस्य । तीरन्वति तपसा ब्रह्मचारी, तत्केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान् ॥

( १ ) एक पास है और दूसरा आकाश से भी दूर है । वे दोनों कोश ब्राह्मण की गृहा में घरे हुये हैं । ( २ ) ब्रह्मचारी अपने तप से उनकी रक्षा करता है । वह रहस्य ब्रह्म-विद्वान् ही जान सकता है ।

( १ ) भौतिक-ज्ञान पास, और आध्यात्मिक ज्ञान बहुत दूर है । वे दोनों वेद में लिपे हुये हैं ।

( २ ) ब्रह्मचारी अपने तपोऽनुष्ठान से उन दोनों को अपने अधिकार में कर लेता है ।

( ३ ) इन दोनों के रहस्य को ब्रह्मज्ञानी पुरुष ही समुचित जानता है ।

'भौतिक-ज्ञान' से भी कठिन 'ब्रह्म-ज्ञान' है । आचार्य उन दोनों को, अपने शिष्य को बेवाध्ययन से सिखला देता है । वह

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श्रध्दवैद्य में ब्रह्मचर्य-सूत्र

भी संसको फिर किसी प्रकार नष्ट नहीं होने देता । जो पुरुष वेद का ज्ञाता नहीं, उसे यह रहस्य नहीं विदित होता ।

( ११ )

अर्वागन्य इतो श्रान्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभस्ती श्रन्तरेये । तयोः श्रयन्ते रंभयोऽपि दृढा स्तानातिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी ॥

( १ ) यहाँ एक है, और दूसरी इस लोक से बहुत दूर है । ये दोनों अग्नि, पृथ्वी और आकाश के बीच में मिल जाती हैं ।

( २ ) उनकी तीव्र किरणें फैली हैं और ब्रह्मचारी उनको तप से अधिकार में करता है ।

( १ ) कर्म ऐहिक और ज्ञान पारलौकिक—ये दो अग्नि हैं । इन दोनों का मिलाप भौतिक और-आध्यात्मिक साधनों से होता है ।

( २ ) इन दोनों की गति बड़ी तीव्र है, जो सर्वत्र प्रसफुटित होती है । ब्रह्मचारी उन दोनों को अपनी तपसा से साथ लेता है ।

ब्रह्मचारी आचार्य के यहाँ रहकर 'वैदिक कर्म' और 'आत्म-ज्ञान' दोनों की साधना करता है । 'कर्म और ज्ञान'—दोनों में ही गूढ़ तत्व भरा हुआ है । जहाँ ये दोनों मिलते हैं—जहाँ इनका समान रूप से आदर किया जाता है, वहाँ अच्छी प्रगति और सफलता मिलती है । इसी से ब्रह्मचर्य की अवस्था में दोनों का बराबर अनुष्ठान करना पड़ता है ।

( १२ )

अभिक्कन्दु स्तनयजसृणः शितिंगो बृहच्छ्रेपोऽनुभूमी जमात् । ब्रह्मचारी सन्नित्त सनोरेतः पृथिव्या तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः ॥

( १ ) घोर गजना करता हुआ, भूरा और साँवला तथा बड़े

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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आकार वाला मेघ भूमि का पोषण करता है। ( २ ) अपने रेतस से पृथिवी और पर्वत को सींचता है और ( ३ ) उससे चारों दिशायें जीवित होती हैं।

( १ ) चन्द्र स्वर से संसार को सनेत करता हुआ, जल्ल-स्वरूप वाला तथा हृष्ट-पुष्ट अज्ञो पाक्षों वाला ब्रह्मचारी संसार का पालन करता है।

( २ ) वह बड़े से लेकर छोटे तक, सब के हित का उपदेश देता है। अर्थात् वह समष्टि होता है।

( ३ ) और उसके उपदेश से चारों ओर लोगों में जीवन पड़ जाता है। अर्थात् सर्वत्र जागृति उत्पन्न होती है।

इस मन्त्र में ब्रह्मचारी को मेघ बंता कर, उससे उसके कार्यों की तुलना की गई है।

जैसे मेघ भीमनाद करता है, वैसे वेद-घोष करने वाला ब्रह्मचारी भी ओजस्वी व्याख्यान देता है। मेघ के स्वरूप में जो सुन्दरता है, वह उसमें भी है। मेघ जैसे बृहत्काय है, वैसे यह भी हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला होता है। वह पृथिवी का पोषण करता है, यह भी जनता का सुधार करता है। वह अपना जल पर्वत से पृथिवी पर्यन्त बरसाता है। यह भी अपना ज्ञानोपदेश, बड़े-छोटे का भेद-भाव छोड़कर, सब लोगों को समान रूप से देता है। उसकी वर्षा ने चारों दिशाओं में आनन्द होता है। इसकी भी शिक्षा से सर्वत्र सुख ही सुख उत्पन्न हो जाता है। अतः शुभ, चर्म तथा स्तभाव के मिल जाने से, ब्रह्मचारी भी मेघ और मेघ भी ब्रह्मचारी बनता। दोनों में कैसी अच्छी समता दर्शाई गई है !

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्यसूक्त

( १३ )

अथोस्यै चन्द्रमसि मातरिभन्व ब्रह्मचार्यसु समिधमादधाति । तासांमर्चीषि पृथगग्ने चरन्ति तासांमात्यं पुरुषो वर्धमापः ॥

( १ ) ब्रह्मचारी अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, वायु और जल में समिधा खालता है । ( २ ) उनकी किरणों अन्य मेघों में पहुँचती हैं । और ( ३ ) उनसे घृत, पुरुष, वर्ष और जल की उत्पत्ति होती है ।

( १ ) ब्रह्मचारी वायु, नैत्र, मन, प्राण और वीर्य की शक्तियों को बढ़ाता है ।

( २ ) इन शक्तियों के प्रभाव से वह दूसरे व्यक्ती लोगों को भी प्रभावित करता है ।

( ३ ) और उन शक्तियों के कारण बुद्धि, बल, ज्ञान, सुख और शान्ति की उत्पत्ति होती है ।

ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास से अपनी आत्मिक और शारीरिक शक्तियों को बढ़ाता है । फिर वह अन्य सुपात्र लोगों को इन शक्तियों के बढ़ाने का उपदेश करता है । इस प्रकार उसके कारण उनमें बुद्धि, बल, ज्ञान, सुख और शान्ति की बुद्धि होती है । ऊपर के मन्त्र का यही मूल तात्पर्य है ।

( १४ )

आचार्यां मृत्युर्वरुणः सोम श्रोषधयः पयः ।

जीमूता,आखन्तस्तत्त्वानस्तेरिदं स्वराभृतम् ॥

आचार्य मृत्यु, वरुण, सोम, श्रोषध और पय है । उसके सद्भाव मेघ हैं, उनसे यह तेज रचित होता है ।

आचार्य अहान-नाशक, सदाचार-शिक्षक, शान्ति-दायक, बुद्धि-

प्रसूच्य-विज्ञान

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कारक और उत्साह-वर्द्धक होता है। उसके सात्विक गुणों से यह अधिकार प्राप्त होता है।

आचार्य अपने ब्रह्मचारी शिष्य के अज्ञान-रूपी शरीर का नाश कर, उसकी सदाचार की शिक्षा देता है। उसकी शान्ति और पवित्रता के लिये यज्ञ करता है, और सत्कर्म करने के लिये सदा उत्साहित करता रहता है। उसके सात्विक गुणों से ही विद्यार्थी पर उत्तम प्रभाव पड़ता है। इसीलिये उसका इतना महत्व है। वास्तव में ब्रह्मचारी के लिये वह सब कुछ है।

( १५ )

अमा धूर्तकणुते केवलमाचार्या भूत्वा वरुणो यद्यदेच्छत् प्रजापती। वदुब्रह्मचारी प्रायच्छत् स्वान् मित्रो अभ्यारभनः ॥

(१) आचार्य शिष्य के सम्मेलन से केवल छुत निकालता है। और (२) बरुण बन कर, जो जो प्रजापति के लिये चाहता है, सो सो सूर्य ब्रह्मचारी अपनी आत्मिकता से प्रदान करता है।

(१) आचार्य अपने यहाँ रहने वाले ब्रह्मचारी के सहवास से परमोत्तम ज्ञान को उत्पन्न करता है।

(२) और मार्ग दर्शक बन कर प्रजा के पालन के लिये, जो विचार करता है, उसे वह सूर्य सा प्रतिभावान् ब्रह्मचारी अपनी योग्यता से पूर्ण करता है।

आचार्य अपने शिष्य ब्रह्मचारी को पास रख कर, गूढ़ तत्वों का उपदेश करता है। उसकी शङ्काओं का समाधान करता है। वह जिन श्रेष्ठ विचारों को जनता के हित के, उस पर प्रकट करता है, वह भी योग्य हो कर, अपने आचार्य की आज्ञा का पालन करता है।

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

( १६ )

आचार्यों ब्रह्मचारी प्रजापतिः । प्रजापतिर्विराजति विराडिन्द्रो भयद्वशी ॥

( १ ) आचार्य ब्रह्मचारी है ( २ ) प्रजापति ब्रह्मचारी है । प्रजापति विराजित होता है, ( ३ ) और संयमी विराट् इन्द्र है ।

( ४ ) आचार्य ब्रह्मचारी रह कर, ज्ञानोपदेश करता है ।

( ५ ) आचार्यश भी ब्रह्मचर्य का पालन कर शासन करता है ।

( ३ ) और संयमी राजा भी नृपेन्द्र कहलाता है ।

आचार्य शिष्य पर और राजा प्रजा पर शासन करता है । इस लिये इन दोनों को ब्रह्मचारी होना योग्य है । अर्थात् इन्हें ज्ञानी और वली होना चाहिये । क्योंकि आचार्य का अनुकरण उसके शिष्य तथा राजा के आचरण का अनुकरण उसकी प्रजा करती है । यदि ये ब्रह्मचारी न हों, कुसर्गगामी हों, तो इन दोनों शिल्प्य और प्रजा के ब्रह्मचर्य में बाधा पहुँचती है । ठीक है:—

“यथा गुरुस्तथा शिष्यो, यथा राजा तथा प्रजा ।”

( १७ )

ब्रह्मचर्येय तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ।

आचार्यों ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिण मिच्छते ॥

( १ ) ब्रह्मचर्य के तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है । और

( २ ) आचार्य ब्रह्मचर्य से ब्रह्मचारी को चाहता है ।

( १ ) ब्रह्मचर्य के प्रभाव से राजा अपनी प्रजा को अधिकार में रखता है ।

( २ ) और आचार्य ब्रह्मचर्य के ही कारण अपने विद्यार्थी का भ्रिय करता है ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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देश की सुख-शान्ति के दो ही स्तम्भ हैं। एक राजा और दूसरा आचार्य। इन दोनों को ब्रह्मचारी होना चाहिये। एक 'बल' से और दूसरा 'ज्ञान' से लोक-सेवा करता है। इस दृष्टि से यहाँ दोनों में समानता है, जिस राजा में विक्रम नहीं, उसकी प्रजा उच्छृङ्खल हो जाती है और जिस आचार्य में बोध नहीं, उसका शिष्य भी अपट, अयोग्य तथा मूर्ख हो जाता है। विक्रम और बोध दोनों का मूल 'ब्रह्मचर्य' ही है।

(१८)

ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्। अनद्युवानं ब्रह्मचर्येणश्चो घासं जिगीर्षति ॥

(१) ब्रह्मचर्य से कन्या युवक पति वरती है और (२) वृषभ तथा अन्य भी ब्रह्मचर्य-पालन से घास खाता है।

(१) कन्या ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर, योग्य और युवा पति को प्राप्त करती है।

(२) और वीर्यवान् इन्द्रिय-समृद्ध भी ब्रह्मचर्य-बल से ही अपने विषयों का उपभोग कर सकता है।

जैसे बालक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वैसे ही कन्यायें भी ब्रह्मचर्य का पालन करती हैं। तपश्चात् वे अपने सहस्र वर से परिणय करने योग्य होती हैं। अनद्युवान का अभिप्राय 'वीर्यवान्' और अन्य का 'इन्द्रिय-समृद्ध' और घास का उसके 'विषय' से है। ब्रह्मचर्य के पालन से इन्द्रिय-समृद्ध वीर्यवान् (परिपुष्ट) हो जाता है। परिपुष्ट होने पर, ही वह अपने व्यापार को समुचित रूप में कर सकता है।

उदाहरण के लिये एक इन्द्रिय 'नेत्र' को ही लीजिये। इसका

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

विषय अवलोकन है। यदि यह अशक्त हो जाय, तो ठीक-ठीक देखने का व्यापार नहीं हो सकता।

अनद्वान, अस्व और घास का प्रचलित अर्थ नहीं। यदि ऐसा होता, तो वेद की, इस कन्या के ब्रह्मचर्य वाली ऋचा के साथ यह असङ्गत बात न कही जाती !

ऊपर के मन्त्र में 'अलङ्कार-रूप से यही बात समझाई गई है। इससे पुरुष-स्त्री सब के लिये ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक प्रतीत होता है।

( १६ )

ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाधत ।

इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरन् ॥

(१) ब्रह्मचर्य के तप से देवों ने मृत्यु को जीता। और (२) इन्द्र ब्रह्मचर्य से ही देवों में तेज भरता है।

(१) अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालन से ही विद्वानों ने अकाल मृत्यु को वश में किया।

(२) और ब्रह्मचर्य के ही प्रताप से सर्व-श्रेष्ठ विद्वान, योग्य पुरुषों को आनन्दप्रदाय करता है।

प्राचीन समय में कई अखण्ड ब्रह्मचारी हो गये हैं, जो मृत्यु को भी कुछ नहीं समझते थे। जब उनकी इच्छा होती थी, तभी शरीर छोड़ते थे। यही मृत्यु पर विजय प्राप्त करना कहलाता है ?

विना ब्रह्मचर्य के कोई उत्तम विद्वान नहीं हो सकता। इसी लिये जो परमोत्तम विद्वान होना चाहे, वह ब्रह्मचर्य का अवश्य पालन करे। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही वह जन्मा के योग्य पुरुषों में प्रतिष्ठित हो सकता है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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(२०)

ओपधयो भूतभव्य महोरात्रे चनस्पतिः । सम्बन्धतः सहर्तुमित्ते जाता ब्रह्मचारिणः ॥

ओपध, वनस्पति, भूत-भव्य, दिन-रात और ऋतुओं के साथ सम्बन्धतः, सभी ब्रह्मचारी हैं ।

औपधियों, वनस्पतियों, भूत-भविष्य, दिन-रात और ऋतुओं के साथ रमने वाला सम्बन्ध, सभी में ब्रह्मचय है ।

यदि ये सब नियमों के अनुकूल न चले, तो इनमें शक्ति नहीं रह जाती । संयम से ही सब की स्थिति है । जड़-जड़मय संसार भर में ब्रह्मचर्य का महत्व है । अतः मनुष्य को ब्रह्मचर्य में अद्वाखनी चाहिये ।

( २१ )

पार्थिवं दिव्याः पशव आरण्या आन्याच्छये ।

अपत्ता पक्षिणश्च ये ते आता ब्रह्मचारिणः ॥

पृथिवी पर 'चलने वाले, आकाश में उड़ने वाले तथा वन और ग्राम के पशु-पक्षी, सब ब्रह्मचारी हैं ।

स्थलचर, नभचर, वन और ग्राम में रहने वाले जितने पशु-पक्षी हैं, सभी अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा करते हैं । इनमें परमेश्वर ने एक शक्ति ऐसी दी है, जिससे कि ये ब्रह्मचर्य के महत्व को अपने हृदय में अनुभव करते हैं । इनमें ब्रह्मचर्य-रक्षा की स्वाभाविक परिपाटी होती है । इनसे मनुष्यों को भी यही शिक्षा लेनी चाहिये ।

( २२ )

पृथक् सर्वं ब्रह्मपत्याः प्राणानामस्तु विभ्रति ।

तान्त्वसर्वां ब्रह्म रक्षति ब्रह्मचारिण्यां भूतम् ॥

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ब्रह्मवैवेद में ब्रह्मचर्य-सूत्र

( १ ) प्रजापति से सब उत्पन्न हुये हैं । सब पृथक्-पृथक् अपने में प्राण रखते हैं । और ( २ ) ब्रह्मचारी में धारण किया हुआ ब्रह्म, उन सब की रक्षा करता है ।

( १ ) उस पूर्य परम पिता परमात्मा से सभी जीवों तथा पदार्थों की उत्पत्ति हुई है । उन सब में अलग-अलग जीवन-शक्ति विद्यमान है ।

( २ ) और ब्रह्मचारी जिस ब्रह्म को अपने आत्मा में अधिष्ठित करता है, वह उन सबको सुरक्षित रखता है ।

यह सारी सृष्टि परमेश्वर की ही बनाई हुई है । नाम और रूप के भेद से सब वस्तुयें पृथक्-पृथक् सत्ता में ज्ञात पड़ती हैं । ब्रह्मचारी इसीलिये अपने ब्रत का पालन करता है कि वह श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त कर विश्वभर का कल्याण करने में समर्थ हो । ब्रह्मचर्य के पालन से ही संसार की रक्षा होती है ।

( २३ )

देवानामेतत् परिपुत्रमतभ्याकृद् स्वप्ति रोचमानम् । तस्माज्ज्ञातं प्राहार्ण्यं प्रह ज्येष्ठं देवाश्च सर्वं श्रमूतेन साकम् ॥

( १ ) देवों का यह अत्यन्त गौरवान्वित तथा उत्साह-वर्द्धक सेव है । ( २ ) उससे सर्व-श्रेष्ठ ब्राह्मण की उत्पत्ति होती है । और ( ३ ) देव लोग अमृत के साथ निवास करते हैं ।

( १ ) यह विद्वानों का गूढ़ तथा साहस बढ़ाने वाला सेव उत्पत्ति करता है ।

( २ ) उस तेजोबल से उनमें परमोत्तम ब्रह्मज्ञान की वृद्धि होती है ।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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( ३ ) और सब सदगुण इस अमृत (न मरनेवाला पदार्थ) के सङ्ग में रहते हैं ।

ब्रह्मचर्य ही विद्वान् लोगों का उच्च तथा उत्साह-दायक ध्येय है । वे इसका पूर्ण रूप से पालन करते हैं । इसका सद्भाव उनके उन्नत बनाता है । इससे उनके हृदय में सब से उत्तम, ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, और ब्रह्मज्ञान के प्राप्त होने से उन के अन्तर्गत सभी अच्छे गुण अपने आप स्थायी रूप से रहने लगते हैं । अर्थात् उनके सदभ्यस्त विचार स्वलिप्त नहीं होने पाते ।

( २४ )

ब्रह्मचारी ब्रह्म ज्ञानद्वु विभ्रमिन् । तस्मिन्नेवा श्रुधि विश्वसे समोता । प्राणापानी जनयन्नाह्व्यान् वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम् ॥

( १ ) ब्रह्मचारी कमकीले ब्रह्म को भरता है । ( २ ) उसमें सब देवलोग रहते हैं और ( ३ ) प्राण, अपान, न्यान, वाचा, मन, ज्ञान और मेधा उत्पन्न करता है ।

( १ ) ब्रह्मचारी उत्कृष्ट ब्रह्मचर्य का पालन करता है ।

( २ ) इस से सभी संसार के सदगुण उस में एकत्र हो जाते हैं ।

( ३ ) और वह अपने अनुष्ठान से प्राणों, वाचा-शक्ति, मन, हृदय, ज्ञान और बुद्धि को पुष्ट करता है ।

वीर्य ही परमेश्वर का तात्विक रूप है । ब्रह्मचारी उसे अपने शरीर में धारण करता है । इस चर्या से उसके सभी दिव्य गुणों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार वह अपने तप के प्रभाव से समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों को प्रबल और संयमित बनाता है ।

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्तः

( २५ )

चक्षुः श्रोत्रं यशो श्रुत्मासु धेयान्ते रेतो लोहितं मुद्रम् ॥

हमलोगों को चक्षु, श्रोत्र, यश, अत्र, रेतस, लोहित और वदर दो ।

हे ब्रह्मचारी ! हमको सुष्ठि, सुश्रवण, कीर्ति, प्राण, वीर्य, रक्त और पालन-पोषण करने की शक्ति दो । ब्रह्मचर्य के अधीन विश्व की वाण तथा आभ्यन्तर सभी शक्तियाँ होती हैं । परमात्मा भी ब्रह्मचारी है और ब्रह्मचारी भी परमात्म-रूप है । इसीलिये वसंत इन सब दिव्य शक्तियों की याचना की गई है । हे परमात्मा के अंशभूत ब्रह्मचारी ! तुम जनता में सुख और शान्ति के बढ़ाने के लिये नाना प्रकार के सदाचार-सम्बन्धी उपदेश करो, तथा ऐसे यज्ञ बताओ, जिनसे कि संसार के अमङ्गल-कारी अव-गुणों का नाश हो !

( २६ )

तानि कल्पहू ब्रह्मचारो सलिलस्य पृष्टे तपोऽतिष्ठत्प्यमानः समुद्रे । स स्नातो बभ्रुः विंगलः पृथिव्यां वह्य रोचते ॥

( १ ) ब्रह्मचारी उन सबों का उपक्रम करता है ( २ ) वह समुद्र में तप होने वाला जल के पीठ पर तप करता है । और ( ३ ) वह स्नान कर के अत्यन्त तेज वाला होकर, पृथिवी में अच्छा माना जाता है ।

( १ ) ब्रह्मचारी ऊपर कहे, गये, उन सब सदगुणों और विश्व-मुखाय के उपदेशों की योजना करता है ।

( २ ) वह ज्ञान-रूपी सागर में अपने को तपा कर, सुख रूपी जल के तीर पर अपने व्रत का अनुष्ठान करने लगता है ।

अष्टाध्याय-विज्ञान

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(३) और वह तेजस्वी स्नातक बनकर संसार में अपने सद्गुणद्वारा से सम्मानित होता है।

ब्रह्मचारी आचार्य के समीप रहकर, विद्याध्ययन से नाना प्रकार की शारीरिक और मानसिक शिक्षाएँ प्राप्त करता है। वह अत्यन्त परिश्रम से ज्ञानार्जन कर के सुख के समीप पहुँचता है। वह अपने को योग्य बना कर अपनी परम श्रेष्ठता, योग्यता और गौरव-गारिमा से संसार में शोभित होता है। वह जनता का हित करता है, और उसकी जनता उचित पूजा करती है।

वस्तुतः वीर्य-रक्षण से ही आत्मिक शक्तियाँ विकसित हो सकती हैं। अवियंवान पुरुष को कभी जीवन में सफलता नहीं मिलती। जो अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष हैं, उन्हें इस वैदिक सूक्त की शिक्षाओं पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिये। यदि वे उनके अनुकूल चलने का प्रयत्न करेंगे, तो उनके जीवन में सुख ही सुख देखलाई पड़ेगा। वेद भगवान् का कथन कभी असत्य नहीं हो सकता। इसे निश्चय समझो !

(अथर्ववेद ११, ४, १०-२६)


जिनमें ऊपर के मन्त्रों की विशेष व्याख्या देबनी हो, वे लेखक की 'हिन्दी में अष्टाध्याय-सूक्त' नाम की पुस्तिका पढ़ें।

द्वितीय खण्ड

१—ब्रह्म-वन्दना

ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च।

नमः शङ्कराय च मयस्कराय च।

नमः शिवाय च शिवतराय च ॥

( खुर्दोद श० १६ म० ४१ )

सुख-स्वरूप और आनन्दमय परमात्मा को नमस्कार है— कल्याणकारी और मोक्षदाता प्रभु को नमस्कार है। और मङ्गल- कारी तथा अत्यन्त सुख देने वाले को नमस्कार है।

हे प्रभो ! तुमने अपने योग बल से कामदेव को दण्ड कर दिया था। तुम्हारे योगयुक्त चित्त में विकार स्थान न पा सका। हम लोग तुम्हारी इस लिये उपासना करते हैं कि हमारे हृदय में काम-विकार उत्पन्न न हो। तुम हमें ऐसा बल दो कि हम ब्रह्म- चर्य का पालन करें, जिससे कि तुम्हारे स्नेह-भाजन बनें।

अशिव विचारों से ही ब्रह्मचर्य का नाश होता है। जब हम अपने को शिव-स्वरूप समझेंगे, तो फिर हमारे ऊपर कामदेव अपना बाण न चला सकेगा। यदि ऐसा करेगा, तो उसका सिंहास ही पराजय होगा। हम सुख और शान्तिदायक विविध नामों से तुम्हारी उपासना इसलिये करते हैं कि हमारा मङ्गल हो। विना तुम्हारी अनुकम्पा के हमारा तप ब्रह्मचर्य सिद्ध नहीं हो सकता।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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अतः कल्याण की कामना से हमें अपने गुणों को प्रदान कर अपने नाम का सार्थक करा !

२—त्रिविध ब्रह्मचर्य

कायेन मनसा वाचा, सर्वाचस्थासु सर्वदा । सर्वत्र मैथुन-त्यागो, ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ॥

(महाशुभि याज्ञवल्क्य )

शरीर, मन और वचन से सब अवस्थाओं में, सर्वदा और सर्वत्र मैथुन (सम्भोग) त्याग के नाम को ब्रह्मचर्य कहा जाता है । महाशुभि याज्ञवल्क्य के मत से कायिक, मानसिक और वाचिक—ये तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य होते हैं । इन तीनों के समूह का नाम 'सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य' है । अतएव इन तीनों का पालन करने वाला पुरुष ही सम्पूर्ण ब्रह्मचारी होने के योग्य है ।

१—कायिक ब्रह्मचर्य—हाव, भाव, एवं कटाक्ष, लुम्बन, आलिङ्गन, अङ्गमर्दन तथा उपस्थेन्द्रिय के सञ्चालन से सब प्रकार प्रयुक्त रहने को कहते हैं ।

२—मानसिक ब्रह्मचर्य—विषय-चिन्तन, सम्भोग के मनोरथ, कामोद्दीपन साधनों की भावना, एवं विकारों के संग्रह को भली भाँति त्याग देना ही माना गया है ।

३—और वाचिक ब्रह्मचर्य—श्रेष्ठात्माप, विषय सम्बन्धों वर्या, शुद्ध सन्भावण एवं हृदय में काम-विकार उत्पन्न करने वाली चालुर्य-पूर्ण कथा से विरक्त रहने का नाम है ।

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निर्विघ्न ब्रह्मचर्य

वहुत से लोग ऐसे हैं, जो कायिक ब्रह्मचर्य का पालन करने पर भी मानसिक और वाचिक का पालन नहीं कर सकते। वे समझते हैं कि कायिक पाप ही पाप है। मानसिक और वाचिक पाप, पाप नहीं। यही कारण है कि वे कुछ ही दिनों में कायिक ब्रह्मचर्य को भी छोड़ बैठते हैं। हमारे विचार से कायिक ब्रह्मचर्य का रूप बहुत स्थूल है। इसके पालन में इतनी कठिनाता नहीं, जितनी कि मानसिक और वाचिक के पालन में है।

हमारे विचार से 'मानसिक' ब्रह्मचर्य उत्तम, 'वाचिक' मध्यम और 'शारीरिक' अधम है। मन, वचन तथा कर्म का आपस में बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध है।

कुछ लोग ऐसे हैं, जो विचारते हैं कि वाचिक ब्रह्मचर्य में क्या धरा है। उसके छोड़ने से कुछ हानि नहीं हो सकती। ऐसी धारणा कर, वे वास्तव में मूर्खता करते हैं। वाचनिक ब्रह्मचर्य के बिगड़ने से कायिक ब्रह्मचर्य भी निस्सन्देह नष्ट हो जाता है। जा वाचनिक ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकता है, भला वह कायिक को पालन कैसे कर सकेगा ?

वहुत से लोग मनोविज्ञान का महत्व न जान कर, मानसिक ब्रह्मचर्य की अवहेलना करते हैं। वे यह नहीं जानते कि मनकी ही 'मेरुश्या-से पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ काम करती हैं। वह इस शरीर का राजा है। वह जिस अवयव को चाहता है, उसे उसके विषय में तत्काल लगा देता है।

अब हम आगे के लेख में मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता दिखा देने की चेष्टा करेंगे।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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३—मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता

यन्मनसां मनुते तद्वाचावदति, यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति, यत्कर्मणा करोति तदस्मिन्मपद्यते ।

( यजुर्वेदब्रह्मण )

जिसका मन में धिन्तन किया जाता है, वही बाणी से निकलता है, जो कुछ बाणी से निकलता है, वही कर्म किया जाता है, और जैसा कुछ कर्म किया जाता है, वैसा उसका फल भी मिलता है ।

ऊपर के मन्त्र में मन की स्पष्ट रूप से प्रधानता दिखाई गई है। मन का ही अधिकार वचन और कर्म पर है। मानसिक विकार ही वाचिक और कायिक विकारों का मूल है । अतएव मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष ही वाचिक और कायिक ब्रह्मचर्य पाल सकता है । बहुत उचित कहा गया है:—

“मन एव मनुष्याणां, कारणं बन्ध-मोक्षयोः”

मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण, उसका मन ही है । सब से पहले मन की ही साधना की जाती है । जिसका मन सद्य गया है, उसका वचन और शरीर पर भी अधिकार हो जाता है । जिसका मानसिक ब्रह्मचर्य छूट जाता है, उसका वाचिक और कायिक भी स्वयं छूट जाता है । इसीलिये मानसिक ब्रह्मचर्य ही का पालन करना प्रधान है । इसी के द्वारा कुछ दिनों में वाचिक और कायिक ब्रह्मचर्य भी स्वयं सद्य जाता है ।

मानसिक ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में एक पौराणिक आख्यायिका

१०५

मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता

है। वह हमारे विचार से रहस्य मयी और शिन्ना-श्यायिनी है। हम उसे पाठकों के हितार्थ यहाँ देना उचित समझते हैं:—

एक समय पितामह ब्रह्माजी तपोवन में जा कर तपस्या करने लगे। इत अनुष्ठान में उन्हें लगभग ३००० वर्ष बीत गये। यह दशा देख कर देवों के राजा इन्द्र को अत्यन्त द्वेष और भय हुआ। उन्होंने समझा कि कहीं ऐसा न हो कि तप सिद्ध होने पर, हमारे इन्द्रासन की मर्यादा हीन हो जाय। अतः उन्होंने तिलोत्तमा नाम की एक अस्सरा को तपोबन्ध करने की मेजा। वह अस्सरा तपोवन में आकर अपना हाथ, भाव और कदाच करने लगी। यह दृश्य देख कर ब्रह्माजी के मन में विकार उत्पन्न हो गया। वह जिधर-जिधर जाती थी, वे भी षष्ठर-वृषर काम-टष्टि से उसे देखते थे। इसके अन्तर्त वह इन्द्र के पास लौट आई। पर ब्रह्मा जी अपने मानसिक ब्रह्मचर्य से पतित होने के कारण, अपने तीन सहस्र वर्ष की तपस्या के फल से हाथ धो बैठे !

इस आख्यायिका के पढ़ने से पाठक समझ गये होंगे कि मानसिक ब्रह्मचर्य ही प्रधान ब्रह्मचर्य है। जब ब्रह्माजी जैसे दिव्य पुरुष को मानसिक ब्रह्मचर्य के छोड़ने से पतित होना पड़ा, तो फिर हमलोग तो साधारण जीव हैं। अतः मानसिक ब्रह्मचर्य का भली भाँति पालन करने वाला ही सच्चा ब्रह्मचारी है।

हम ने जहाँ तक कथा-पुराणों में देखा है, सर्वत्र ही इस मानसिक ब्रह्मचर्य को कायिक और वाचिक का मूल माना गया है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

१०६

४—ब्रह्मचर्य से विद्याध्ययन

“विद्यायां विन्दतेऽमृतम् ।

( शुद्धकोमानिषत् )

विद्या के प्रभाव से परमानन्द मिलता है ।

ब्रह्मचर्येण विद्या, विद्यायां ब्रह्मलोकम् ।

( अथर्व-संहिता )

वीर्य-रक्षा के द्वारा ही विद्या प्राप्त होती है और विद्या के मिलने से ही मनुष्य ब्रह्मलोक का सुख पाता है ।

ऊपर के मंत्र में यह बात कही गई है कि ब्रह्मचर्य ही विद्या का मूल है । बिना ब्रह्मचर्य के विद्या की उपलब्धि नहीं हो सकती, जो वास्तव में सत्य है ।

ब्रह्मचर्य और विद्या में वृद्ध और शाखा के समान सम्बन्ध है । यही कारण है कि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही विद्या के अध्ययन करने का नियम प्रचलित किया गया था । ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य की अवस्था में ही वेद-वेदाङ्गों का अभ्यास कर लेते थे । और जब तक विद्या प्राप्त नहीं हो जाती थी, गृहस्थाश्रम में पैर नहीं घरते थे ।

जो विद्या ब्रह्मचर्य के द्वारा गृहीत होती है, वह कभी खंखलित नहीं होती ! वीर्य के प्रभाव से ज्ञान के गूढ़ तत्वों का शीघ्र ही हृदयङ्गम हो जाता है । विद्यार्थी की धारणा-शक्ति सदा जागृत और तीव्र रहती है, जिससे कि वह थोड़े ही अभ्यास से विशेष लाभान्वित होता है । ओ लोग ब्रह्मचर्ययुक्त विद्याध्ययन करते