भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता

है। वह हमारे विचार से रहस्य मयी और शिन्ना-श्यायिनी है। हम उसे पाठकों के हितार्थ यहाँ देना उचित समझते हैं:—

एक समय पितामह ब्रह्माजी तपोवन में जा कर तपस्या करने लगे। इत अनुष्ठान में उन्हें लगभग ३००० वर्ष बीत गये। यह दशा देख कर देवों के राजा इन्द्र को अत्यन्त द्वेष और भय हुआ। उन्होंने समझा कि कहीं ऐसा न हो कि तप सिद्ध होने पर, हमारे इन्द्रासन की मर्यादा हीन हो जाय। अतः उन्होंने तिलोत्तमा नाम की एक अस्सरा को तपोबन्ध करने की मेजा। वह अस्सरा तपोवन में आकर अपना हाथ, भाव और कदाच करने लगी। यह दृश्य देख कर ब्रह्माजी के मन में विकार उत्पन्न हो गया। वह जिधर-जिधर जाती थी, वे भी षष्ठर-वृषर काम-टष्टि से उसे देखते थे। इसके अन्तर्त वह इन्द्र के पास लौट आई। पर ब्रह्मा जी अपने मानसिक ब्रह्मचर्य से पतित होने के कारण, अपने तीन सहस्र वर्ष की तपस्या के फल से हाथ धो बैठे !

इस आख्यायिका के पढ़ने से पाठक समझ गये होंगे कि मानसिक ब्रह्मचर्य ही प्रधान ब्रह्मचर्य है। जब ब्रह्माजी जैसे दिव्य पुरुष को मानसिक ब्रह्मचर्य के छोड़ने से पतित होना पड़ा, तो फिर हमलोग तो साधारण जीव हैं। अतः मानसिक ब्रह्मचर्य का भली भाँति पालन करने वाला ही सच्चा ब्रह्मचारी है।

हम ने जहाँ तक कथा-पुराणों में देखा है, सर्वत्र ही इस मानसिक ब्रह्मचर्य को कायिक और वाचिक का मूल माना गया है।