भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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३—मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता

यन्मनसां मनुते तद्वाचावदति, यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति, यत्कर्मणा करोति तदस्मिन्मपद्यते ।

( यजुर्वेदब्रह्मण )

जिसका मन में धिन्तन किया जाता है, वही बाणी से निकलता है, जो कुछ बाणी से निकलता है, वही कर्म किया जाता है, और जैसा कुछ कर्म किया जाता है, वैसा उसका फल भी मिलता है ।

ऊपर के मन्त्र में मन की स्पष्ट रूप से प्रधानता दिखाई गई है। मन का ही अधिकार वचन और कर्म पर है। मानसिक विकार ही वाचिक और कायिक विकारों का मूल है । अतएव मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष ही वाचिक और कायिक ब्रह्मचर्य पाल सकता है । बहुत उचित कहा गया है:—

“मन एव मनुष्याणां, कारणं बन्ध-मोक्षयोः”

मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण, उसका मन ही है । सब से पहले मन की ही साधना की जाती है । जिसका मन सद्य गया है, उसका वचन और शरीर पर भी अधिकार हो जाता है । जिसका मानसिक ब्रह्मचर्य छूट जाता है, उसका वाचिक और कायिक भी स्वयं छूट जाता है । इसीलिये मानसिक ब्रह्मचर्य ही का पालन करना प्रधान है । इसी के द्वारा कुछ दिनों में वाचिक और कायिक ब्रह्मचर्य भी स्वयं सद्य जाता है ।

मानसिक ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में एक पौराणिक आख्यायिका