भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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निर्विघ्न ब्रह्मचर्य

वहुत से लोग ऐसे हैं, जो कायिक ब्रह्मचर्य का पालन करने पर भी मानसिक और वाचिक का पालन नहीं कर सकते। वे समझते हैं कि कायिक पाप ही पाप है। मानसिक और वाचिक पाप, पाप नहीं। यही कारण है कि वे कुछ ही दिनों में कायिक ब्रह्मचर्य को भी छोड़ बैठते हैं। हमारे विचार से कायिक ब्रह्मचर्य का रूप बहुत स्थूल है। इसके पालन में इतनी कठिनाता नहीं, जितनी कि मानसिक और वाचिक के पालन में है।

हमारे विचार से 'मानसिक' ब्रह्मचर्य उत्तम, 'वाचिक' मध्यम और 'शारीरिक' अधम है। मन, वचन तथा कर्म का आपस में बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध है।

कुछ लोग ऐसे हैं, जो विचारते हैं कि वाचिक ब्रह्मचर्य में क्या धरा है। उसके छोड़ने से कुछ हानि नहीं हो सकती। ऐसी धारणा कर, वे वास्तव में मूर्खता करते हैं। वाचनिक ब्रह्मचर्य के बिगड़ने से कायिक ब्रह्मचर्य भी निस्सन्देह नष्ट हो जाता है। जा वाचनिक ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकता है, भला वह कायिक को पालन कैसे कर सकेगा ?

वहुत से लोग मनोविज्ञान का महत्व न जान कर, मानसिक ब्रह्मचर्य की अवहेलना करते हैं। वे यह नहीं जानते कि मनकी ही 'मेरुश्या-से पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ काम करती हैं। वह इस शरीर का राजा है। वह जिस अवयव को चाहता है, उसे उसके विषय में तत्काल लगा देता है।

अब हम आगे के लेख में मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता दिखा देने की चेष्टा करेंगे।