भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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अतः कल्याण की कामना से हमें अपने गुणों को प्रदान कर अपने नाम का सार्थक करा !

२—त्रिविध ब्रह्मचर्य

कायेन मनसा वाचा, सर्वाचस्थासु सर्वदा । सर्वत्र मैथुन-त्यागो, ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ॥

(महाशुभि याज्ञवल्क्य )

शरीर, मन और वचन से सब अवस्थाओं में, सर्वदा और सर्वत्र मैथुन (सम्भोग) त्याग के नाम को ब्रह्मचर्य कहा जाता है । महाशुभि याज्ञवल्क्य के मत से कायिक, मानसिक और वाचिक—ये तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य होते हैं । इन तीनों के समूह का नाम 'सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य' है । अतएव इन तीनों का पालन करने वाला पुरुष ही सम्पूर्ण ब्रह्मचारी होने के योग्य है ।

१—कायिक ब्रह्मचर्य—हाव, भाव, एवं कटाक्ष, लुम्बन, आलिङ्गन, अङ्गमर्दन तथा उपस्थेन्द्रिय के सञ्चालन से सब प्रकार प्रयुक्त रहने को कहते हैं ।

२—मानसिक ब्रह्मचर्य—विषय-चिन्तन, सम्भोग के मनोरथ, कामोद्दीपन साधनों की भावना, एवं विकारों के संग्रह को भली भाँति त्याग देना ही माना गया है ।

३—और वाचिक ब्रह्मचर्य—श्रेष्ठात्माप, विषय सम्बन्धों वर्या, शुद्ध सन्भावण एवं हृदय में काम-विकार उत्पन्न करने वाली चालुर्य-पूर्ण कथा से विरक्त रहने का नाम है ।