ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय खण्ड
१—ब्रह्म-वन्दना
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च।
नमः शङ्कराय च मयस्कराय च।
नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
( खुर्दोद श० १६ म० ४१ )
सुख-स्वरूप और आनन्दमय परमात्मा को नमस्कार है— कल्याणकारी और मोक्षदाता प्रभु को नमस्कार है। और मङ्गल- कारी तथा अत्यन्त सुख देने वाले को नमस्कार है।
हे प्रभो ! तुमने अपने योग बल से कामदेव को दण्ड कर दिया था। तुम्हारे योगयुक्त चित्त में विकार स्थान न पा सका। हम लोग तुम्हारी इस लिये उपासना करते हैं कि हमारे हृदय में काम-विकार उत्पन्न न हो। तुम हमें ऐसा बल दो कि हम ब्रह्म- चर्य का पालन करें, जिससे कि तुम्हारे स्नेह-भाजन बनें।
अशिव विचारों से ही ब्रह्मचर्य का नाश होता है। जब हम अपने को शिव-स्वरूप समझेंगे, तो फिर हमारे ऊपर कामदेव अपना बाण न चला सकेगा। यदि ऐसा करेगा, तो उसका सिंहास ही पराजय होगा। हम सुख और शान्तिदायक विविध नामों से तुम्हारी उपासना इसलिये करते हैं कि हमारा मङ्गल हो। विना तुम्हारी अनुकम्पा के हमारा तप ब्रह्मचर्य सिद्ध नहीं हो सकता।