भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 380 में से

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अष्टाध्याय-विज्ञान

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(३) और वह तेजस्वी स्नातक बनकर संसार में अपने सद्गुणद्वारा से सम्मानित होता है।

ब्रह्मचारी आचार्य के समीप रहकर, विद्याध्ययन से नाना प्रकार की शारीरिक और मानसिक शिक्षाएँ प्राप्त करता है। वह अत्यन्त परिश्रम से ज्ञानार्जन कर के सुख के समीप पहुँचता है। वह अपने को योग्य बना कर अपनी परम श्रेष्ठता, योग्यता और गौरव-गारिमा से संसार में शोभित होता है। वह जनता का हित करता है, और उसकी जनता उचित पूजा करती है।

वस्तुतः वीर्य-रक्षण से ही आत्मिक शक्तियाँ विकसित हो सकती हैं। अवियंवान पुरुष को कभी जीवन में सफलता नहीं मिलती। जो अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष हैं, उन्हें इस वैदिक सूक्त की शिक्षाओं पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिये। यदि वे उनके अनुकूल चलने का प्रयत्न करेंगे, तो उनके जीवन में सुख ही सुख देखलाई पड़ेगा। वेद भगवान् का कथन कभी असत्य नहीं हो सकता। इसे निश्चय समझो !

(अथर्ववेद ११, ४, १०-२६)


जिनमें ऊपर के मन्त्रों की विशेष व्याख्या देबनी हो, वे लेखक की 'हिन्दी में अष्टाध्याय-सूक्त' नाम की पुस्तिका पढ़ें।

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