भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्तः

( २५ )

चक्षुः श्रोत्रं यशो श्रुत्मासु धेयान्ते रेतो लोहितं मुद्रम् ॥

हमलोगों को चक्षु, श्रोत्र, यश, अत्र, रेतस, लोहित और वदर दो ।

हे ब्रह्मचारी ! हमको सुष्ठि, सुश्रवण, कीर्ति, प्राण, वीर्य, रक्त और पालन-पोषण करने की शक्ति दो । ब्रह्मचर्य के अधीन विश्व की वाण तथा आभ्यन्तर सभी शक्तियाँ होती हैं । परमात्मा भी ब्रह्मचारी है और ब्रह्मचारी भी परमात्म-रूप है । इसीलिये वसंत इन सब दिव्य शक्तियों की याचना की गई है । हे परमात्मा के अंशभूत ब्रह्मचारी ! तुम जनता में सुख और शान्ति के बढ़ाने के लिये नाना प्रकार के सदाचार-सम्बन्धी उपदेश करो, तथा ऐसे यज्ञ बताओ, जिनसे कि संसार के अमङ्गल-कारी अव-गुणों का नाश हो !

( २६ )

तानि कल्पहू ब्रह्मचारो सलिलस्य पृष्टे तपोऽतिष्ठत्प्यमानः समुद्रे । स स्नातो बभ्रुः विंगलः पृथिव्यां वह्य रोचते ॥

( १ ) ब्रह्मचारी उन सबों का उपक्रम करता है ( २ ) वह समुद्र में तप होने वाला जल के पीठ पर तप करता है । और ( ३ ) वह स्नान कर के अत्यन्त तेज वाला होकर, पृथिवी में अच्छा माना जाता है ।

( १ ) ब्रह्मचारी ऊपर कहे, गये, उन सब सदगुणों और विश्व-मुखाय के उपदेशों की योजना करता है ।

( २ ) वह ज्ञान-रूपी सागर में अपने को तपा कर, सुख रूपी जल के तीर पर अपने व्रत का अनुष्ठान करने लगता है ।