ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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( ३ ) और सब सदगुण इस अमृत (न मरनेवाला पदार्थ) के सङ्ग में रहते हैं ।
ब्रह्मचर्य ही विद्वान् लोगों का उच्च तथा उत्साह-दायक ध्येय है । वे इसका पूर्ण रूप से पालन करते हैं । इसका सद्भाव उनके उन्नत बनाता है । इससे उनके हृदय में सब से उत्तम, ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, और ब्रह्मज्ञान के प्राप्त होने से उन के अन्तर्गत सभी अच्छे गुण अपने आप स्थायी रूप से रहने लगते हैं । अर्थात् उनके सदभ्यस्त विचार स्वलिप्त नहीं होने पाते ।
( २४ )
ब्रह्मचारी ब्रह्म ज्ञानद्वु विभ्रमिन् । तस्मिन्नेवा श्रुधि विश्वसे समोता । प्राणापानी जनयन्नाह्व्यान् वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम् ॥
( १ ) ब्रह्मचारी कमकीले ब्रह्म को भरता है । ( २ ) उसमें सब देवलोग रहते हैं और ( ३ ) प्राण, अपान, न्यान, वाचा, मन, ज्ञान और मेधा उत्पन्न करता है ।
( १ ) ब्रह्मचारी उत्कृष्ट ब्रह्मचर्य का पालन करता है ।
( २ ) इस से सभी संसार के सदगुण उस में एकत्र हो जाते हैं ।
( ३ ) और वह अपने अनुष्ठान से प्राणों, वाचा-शक्ति, मन, हृदय, ज्ञान और बुद्धि को पुष्ट करता है ।
वीर्य ही परमेश्वर का तात्विक रूप है । ब्रह्मचारी उसे अपने शरीर में धारण करता है । इस चर्या से उसके सभी दिव्य गुणों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार वह अपने तप के प्रभाव से समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों को प्रबल और संयमित बनाता है ।