ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मवैवेद में ब्रह्मचर्य-सूत्र
( १ ) प्रजापति से सब उत्पन्न हुये हैं । सब पृथक्-पृथक् अपने में प्राण रखते हैं । और ( २ ) ब्रह्मचारी में धारण किया हुआ ब्रह्म, उन सब की रक्षा करता है ।
( १ ) उस पूर्य परम पिता परमात्मा से सभी जीवों तथा पदार्थों की उत्पत्ति हुई है । उन सब में अलग-अलग जीवन-शक्ति विद्यमान है ।
( २ ) और ब्रह्मचारी जिस ब्रह्म को अपने आत्मा में अधिष्ठित करता है, वह उन सबको सुरक्षित रखता है ।
यह सारी सृष्टि परमेश्वर की ही बनाई हुई है । नाम और रूप के भेद से सब वस्तुयें पृथक्-पृथक् सत्ता में ज्ञात पड़ती हैं । ब्रह्मचारी इसीलिये अपने ब्रत का पालन करता है कि वह श्रेष्ठ ज्ञान प्राप्त कर विश्वभर का कल्याण करने में समर्थ हो । ब्रह्मचर्य के पालन से ही संसार की रक्षा होती है ।
( २३ )
देवानामेतत् परिपुत्रमतभ्याकृद् स्वप्ति रोचमानम् । तस्माज्ज्ञातं प्राहार्ण्यं प्रह ज्येष्ठं देवाश्च सर्वं श्रमूतेन साकम् ॥
( १ ) देवों का यह अत्यन्त गौरवान्वित तथा उत्साह-वर्द्धक सेव है । ( २ ) उससे सर्व-श्रेष्ठ ब्राह्मण की उत्पत्ति होती है । और ( ३ ) देव लोग अमृत के साथ निवास करते हैं ।
( १ ) यह विद्वानों का गूढ़ तथा साहस बढ़ाने वाला सेव उत्पत्ति करता है ।
( २ ) उस तेजोबल से उनमें परमोत्तम ब्रह्मज्ञान की वृद्धि होती है ।