ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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(२०)
ओपधयो भूतभव्य महोरात्रे चनस्पतिः । सम्बन्धतः सहर्तुमित्ते जाता ब्रह्मचारिणः ॥
ओपध, वनस्पति, भूत-भव्य, दिन-रात और ऋतुओं के साथ सम्बन्धतः, सभी ब्रह्मचारी हैं ।
औपधियों, वनस्पतियों, भूत-भविष्य, दिन-रात और ऋतुओं के साथ रमने वाला सम्बन्ध, सभी में ब्रह्मचय है ।
यदि ये सब नियमों के अनुकूल न चले, तो इनमें शक्ति नहीं रह जाती । संयम से ही सब की स्थिति है । जड़-जड़मय संसार भर में ब्रह्मचर्य का महत्व है । अतः मनुष्य को ब्रह्मचर्य में अद्वाखनी चाहिये ।
( २१ )
पार्थिवं दिव्याः पशव आरण्या आन्याच्छये ।
अपत्ता पक्षिणश्च ये ते आता ब्रह्मचारिणः ॥
पृथिवी पर 'चलने वाले, आकाश में उड़ने वाले तथा वन और ग्राम के पशु-पक्षी, सब ब्रह्मचारी हैं ।
स्थलचर, नभचर, वन और ग्राम में रहने वाले जितने पशु-पक्षी हैं, सभी अपने ब्रह्मचर्य की रक्षा करते हैं । इनमें परमेश्वर ने एक शक्ति ऐसी दी है, जिससे कि ये ब्रह्मचर्य के महत्व को अपने हृदय में अनुभव करते हैं । इनमें ब्रह्मचर्य-रक्षा की स्वाभाविक परिपाटी होती है । इनसे मनुष्यों को भी यही शिक्षा लेनी चाहिये ।
( २२ )
पृथक् सर्वं ब्रह्मपत्याः प्राणानामस्तु विभ्रति ।
तान्त्वसर्वां ब्रह्म रक्षति ब्रह्मचारिण्यां भूतम् ॥