भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त

विषय अवलोकन है। यदि यह अशक्त हो जाय, तो ठीक-ठीक देखने का व्यापार नहीं हो सकता।

अनद्वान, अस्व और घास का प्रचलित अर्थ नहीं। यदि ऐसा होता, तो वेद की, इस कन्या के ब्रह्मचर्य वाली ऋचा के साथ यह असङ्गत बात न कही जाती !

ऊपर के मन्त्र में 'अलङ्कार-रूप से यही बात समझाई गई है। इससे पुरुष-स्त्री सब के लिये ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक प्रतीत होता है।

( १६ )

ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमुपाधत ।

इन्द्रोह ब्रह्मचर्येण देवेभ्यः स्वराभरन् ॥

(१) ब्रह्मचर्य के तप से देवों ने मृत्यु को जीता। और (२) इन्द्र ब्रह्मचर्य से ही देवों में तेज भरता है।

(१) अखण्ड ब्रह्मचर्य के पालन से ही विद्वानों ने अकाल मृत्यु को वश में किया।

(२) और ब्रह्मचर्य के ही प्रताप से सर्व-श्रेष्ठ विद्वान, योग्य पुरुषों को आनन्दप्रदाय करता है।

प्राचीन समय में कई अखण्ड ब्रह्मचारी हो गये हैं, जो मृत्यु को भी कुछ नहीं समझते थे। जब उनकी इच्छा होती थी, तभी शरीर छोड़ते थे। यही मृत्यु पर विजय प्राप्त करना कहलाता है ?

विना ब्रह्मचर्य के कोई उत्तम विद्वान नहीं हो सकता। इसी लिये जो परमोत्तम विद्वान होना चाहे, वह ब्रह्मचर्य का अवश्य पालन करे। ब्रह्मचर्य के प्रभाव से ही वह जन्मा के योग्य पुरुषों में प्रतिष्ठित हो सकता है।