भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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देश की सुख-शान्ति के दो ही स्तम्भ हैं। एक राजा और दूसरा आचार्य। इन दोनों को ब्रह्मचारी होना चाहिये। एक 'बल' से और दूसरा 'ज्ञान' से लोक-सेवा करता है। इस दृष्टि से यहाँ दोनों में समानता है, जिस राजा में विक्रम नहीं, उसकी प्रजा उच्छृङ्खल हो जाती है और जिस आचार्य में बोध नहीं, उसका शिष्य भी अपट, अयोग्य तथा मूर्ख हो जाता है। विक्रम और बोध दोनों का मूल 'ब्रह्मचर्य' ही है।

(१८)

ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम्। अनद्युवानं ब्रह्मचर्येणश्चो घासं जिगीर्षति ॥

(१) ब्रह्मचर्य से कन्या युवक पति वरती है और (२) वृषभ तथा अन्य भी ब्रह्मचर्य-पालन से घास खाता है।

(१) कन्या ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर, योग्य और युवा पति को प्राप्त करती है।

(२) और वीर्यवान् इन्द्रिय-समृद्ध भी ब्रह्मचर्य-बल से ही अपने विषयों का उपभोग कर सकता है।

जैसे बालक ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वैसे ही कन्यायें भी ब्रह्मचर्य का पालन करती हैं। तपश्चात् वे अपने सहस्र वर से परिणय करने योग्य होती हैं। अनद्युवान का अभिप्राय 'वीर्यवान्' और अन्य का 'इन्द्रिय-समृद्ध' और घास का उसके 'विषय' से है। ब्रह्मचर्य के पालन से इन्द्रिय-समृद्ध वीर्यवान् (परिपुष्ट) हो जाता है। परिपुष्ट होने पर, ही वह अपने व्यापार को समुचित रूप में कर सकता है।

उदाहरण के लिये एक इन्द्रिय 'नेत्र' को ही लीजिये। इसका