ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्त
( १६ )
आचार्यों ब्रह्मचारी प्रजापतिः । प्रजापतिर्विराजति विराडिन्द्रो भयद्वशी ॥
( १ ) आचार्य ब्रह्मचारी है ( २ ) प्रजापति ब्रह्मचारी है । प्रजापति विराजित होता है, ( ३ ) और संयमी विराट् इन्द्र है ।
( ४ ) आचार्य ब्रह्मचारी रह कर, ज्ञानोपदेश करता है ।
( ५ ) आचार्यश भी ब्रह्मचर्य का पालन कर शासन करता है ।
( ३ ) और संयमी राजा भी नृपेन्द्र कहलाता है ।
आचार्य शिष्य पर और राजा प्रजा पर शासन करता है । इस लिये इन दोनों को ब्रह्मचारी होना योग्य है । अर्थात् इन्हें ज्ञानी और वली होना चाहिये । क्योंकि आचार्य का अनुकरण उसके शिष्य तथा राजा के आचरण का अनुकरण उसकी प्रजा करती है । यदि ये ब्रह्मचारी न हों, कुसर्गगामी हों, तो इन दोनों शिल्प्य और प्रजा के ब्रह्मचर्य में बाधा पहुँचती है । ठीक है:—
“यथा गुरुस्तथा शिष्यो, यथा राजा तथा प्रजा ।”
( १७ )
ब्रह्मचर्येय तपसा राजा राष्ट्रं विरक्षति ।
आचार्यों ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिण मिच्छते ॥
( १ ) ब्रह्मचर्य के तप से राजा राष्ट्र की रक्षा करता है । और
( २ ) आचार्य ब्रह्मचर्य से ब्रह्मचारी को चाहता है ।
( १ ) ब्रह्मचर्य के प्रभाव से राजा अपनी प्रजा को अधिकार में रखता है ।
( २ ) और आचार्य ब्रह्मचर्य के ही कारण अपने विद्यार्थी का भ्रिय करता है ।