ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रसूच्य-विज्ञान
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कारक और उत्साह-वर्द्धक होता है। उसके सात्विक गुणों से यह अधिकार प्राप्त होता है।
आचार्य अपने ब्रह्मचारी शिष्य के अज्ञान-रूपी शरीर का नाश कर, उसकी सदाचार की शिक्षा देता है। उसकी शान्ति और पवित्रता के लिये यज्ञ करता है, और सत्कर्म करने के लिये सदा उत्साहित करता रहता है। उसके सात्विक गुणों से ही विद्यार्थी पर उत्तम प्रभाव पड़ता है। इसीलिये उसका इतना महत्व है। वास्तव में ब्रह्मचारी के लिये वह सब कुछ है।
( १५ )
अमा धूर्तकणुते केवलमाचार्या भूत्वा वरुणो यद्यदेच्छत् प्रजापती। वदुब्रह्मचारी प्रायच्छत् स्वान् मित्रो अभ्यारभनः ॥
(१) आचार्य शिष्य के सम्मेलन से केवल छुत निकालता है। और (२) बरुण बन कर, जो जो प्रजापति के लिये चाहता है, सो सो सूर्य ब्रह्मचारी अपनी आत्मिकता से प्रदान करता है।
(१) आचार्य अपने यहाँ रहने वाले ब्रह्मचारी के सहवास से परमोत्तम ज्ञान को उत्पन्न करता है।
(२) और मार्ग दर्शक बन कर प्रजा के पालन के लिये, जो विचार करता है, उसे वह सूर्य सा प्रतिभावान् ब्रह्मचारी अपनी योग्यता से पूर्ण करता है।
आचार्य अपने शिष्य ब्रह्मचारी को पास रख कर, गूढ़ तत्वों का उपदेश करता है। उसकी शङ्काओं का समाधान करता है। वह जिन श्रेष्ठ विचारों को जनता के हित के, उस पर प्रकट करता है, वह भी योग्य हो कर, अपने आचार्य की आज्ञा का पालन करता है।