भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्यसूक्त

( १३ )

अथोस्यै चन्द्रमसि मातरिभन्व ब्रह्मचार्यसु समिधमादधाति । तासांमर्चीषि पृथगग्ने चरन्ति तासांमात्यं पुरुषो वर्धमापः ॥

( १ ) ब्रह्मचारी अग्नि, सूर्य, चन्द्रमा, वायु और जल में समिधा खालता है । ( २ ) उनकी किरणों अन्य मेघों में पहुँचती हैं । और ( ३ ) उनसे घृत, पुरुष, वर्ष और जल की उत्पत्ति होती है ।

( १ ) ब्रह्मचारी वायु, नैत्र, मन, प्राण और वीर्य की शक्तियों को बढ़ाता है ।

( २ ) इन शक्तियों के प्रभाव से वह दूसरे व्यक्ती लोगों को भी प्रभावित करता है ।

( ३ ) और उन शक्तियों के कारण बुद्धि, बल, ज्ञान, सुख और शान्ति की उत्पत्ति होती है ।

ब्रह्मचारी अपने ब्रह्मचर्य और विद्याभ्यास से अपनी आत्मिक और शारीरिक शक्तियों को बढ़ाता है । फिर वह अन्य सुपात्र लोगों को इन शक्तियों के बढ़ाने का उपदेश करता है । इस प्रकार उसके कारण उनमें बुद्धि, बल, ज्ञान, सुख और शान्ति की बुद्धि होती है । ऊपर के मन्त्र का यही मूल तात्पर्य है ।

( १४ )

आचार्यां मृत्युर्वरुणः सोम श्रोषधयः पयः ।

जीमूता,आखन्तस्तत्त्वानस्तेरिदं स्वराभृतम् ॥

आचार्य मृत्यु, वरुण, सोम, श्रोषध और पय है । उसके सद्भाव मेघ हैं, उनसे यह तेज रचित होता है ।

आचार्य अहान-नाशक, सदाचार-शिक्षक, शान्ति-दायक, बुद्धि-