ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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आकार वाला मेघ भूमि का पोषण करता है। ( २ ) अपने रेतस से पृथिवी और पर्वत को सींचता है और ( ३ ) उससे चारों दिशायें जीवित होती हैं।
( १ ) चन्द्र स्वर से संसार को सनेत करता हुआ, जल्ल-स्वरूप वाला तथा हृष्ट-पुष्ट अज्ञो पाक्षों वाला ब्रह्मचारी संसार का पालन करता है।
( २ ) वह बड़े से लेकर छोटे तक, सब के हित का उपदेश देता है। अर्थात् वह समष्टि होता है।
( ३ ) और उसके उपदेश से चारों ओर लोगों में जीवन पड़ जाता है। अर्थात् सर्वत्र जागृति उत्पन्न होती है।
इस मन्त्र में ब्रह्मचारी को मेघ बंता कर, उससे उसके कार्यों की तुलना की गई है।
जैसे मेघ भीमनाद करता है, वैसे वेद-घोष करने वाला ब्रह्मचारी भी ओजस्वी व्याख्यान देता है। मेघ के स्वरूप में जो सुन्दरता है, वह उसमें भी है। मेघ जैसे बृहत्काय है, वैसे यह भी हृष्ट-पुष्ट शरीर वाला होता है। वह पृथिवी का पोषण करता है, यह भी जनता का सुधार करता है। वह अपना जल पर्वत से पृथिवी पर्यन्त बरसाता है। यह भी अपना ज्ञानोपदेश, बड़े-छोटे का भेद-भाव छोड़कर, सब लोगों को समान रूप से देता है। उसकी वर्षा ने चारों दिशाओं में आनन्द होता है। इसकी भी शिक्षा से सर्वत्र सुख ही सुख उत्पन्न हो जाता है। अतः शुभ, चर्म तथा स्तभाव के मिल जाने से, ब्रह्मचारी भी मेघ और मेघ भी ब्रह्मचारी बनता। दोनों में कैसी अच्छी समता दर्शाई गई है !