ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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श्रध्दवैद्य में ब्रह्मचर्य-सूत्र
भी संसको फिर किसी प्रकार नष्ट नहीं होने देता । जो पुरुष वेद का ज्ञाता नहीं, उसे यह रहस्य नहीं विदित होता ।
( ११ )
अर्वागन्य इतो श्रान्यः पृथिव्या अग्नी समेतो नभस्ती श्रन्तरेये । तयोः श्रयन्ते रंभयोऽपि दृढा स्तानातिष्ठति तपसा ब्रह्मचारी ॥
( १ ) यहाँ एक है, और दूसरी इस लोक से बहुत दूर है । ये दोनों अग्नि, पृथ्वी और आकाश के बीच में मिल जाती हैं ।
( २ ) उनकी तीव्र किरणें फैली हैं और ब्रह्मचारी उनको तप से अधिकार में करता है ।
( १ ) कर्म ऐहिक और ज्ञान पारलौकिक—ये दो अग्नि हैं । इन दोनों का मिलाप भौतिक और-आध्यात्मिक साधनों से होता है ।
( २ ) इन दोनों की गति बड़ी तीव्र है, जो सर्वत्र प्रसफुटित होती है । ब्रह्मचारी उन दोनों को अपनी तपसा से साथ लेता है ।
ब्रह्मचारी आचार्य के यहाँ रहकर 'वैदिक कर्म' और 'आत्म-ज्ञान' दोनों की साधना करता है । 'कर्म और ज्ञान'—दोनों में ही गूढ़ तत्व भरा हुआ है । जहाँ ये दोनों मिलते हैं—जहाँ इनका समान रूप से आदर किया जाता है, वहाँ अच्छी प्रगति और सफलता मिलती है । इसी से ब्रह्मचर्य की अवस्था में दोनों का बराबर अनुष्ठान करना पड़ता है ।
( १२ )
अभिक्कन्दु स्तनयजसृणः शितिंगो बृहच्छ्रेपोऽनुभूमी जमात् । ब्रह्मचारी सन्नित्त सनोरेतः पृथिव्या तेन जीवन्ति प्रदिशश्चतस्रः ॥
( १ ) घोर गजना करता हुआ, भूरा और साँवला तथा बड़े
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