ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 91, कुल 380 में से
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( २ ) फिर उन परा और अपरा विद्याओं का भजन करता है । जिन्हें आचार्य उसे देता है ।
( ३ ) और इन्हीं दोनों के बीच में सब कुछ भरा पड़ा है । ब्रह्मचारी अपने आचार्य से भौतिक और आध्यात्मिक ज्ञान का भिन्ना लेता है । 'यिद्विक और पारलौकिक' विद्या की प्राप्ति से उसका उद्देश्य सिद्ध हो जाता है । इस यज्ञ के पूर्ण हो जाने पर फिर उसके सारे मनोरथ स्वयं सपते हैं । यही उसकी भिन्ना का आदर्श है ।
( १० )
अर्वागन्यः परोअन्यो दिवस्पृष्टादृगृहानिधी निहितो ब्राह्मणस्य । तीरन्वति तपसा ब्रह्मचारी, तत्केवलं कृणुते ब्रह्म विद्वान् ॥
( १ ) एक पास है और दूसरा आकाश से भी दूर है । वे दोनों कोश ब्राह्मण की गृहा में घरे हुये हैं । ( २ ) ब्रह्मचारी अपने तप से उनकी रक्षा करता है । वह रहस्य ब्रह्म-विद्वान् ही जान सकता है ।
( १ ) भौतिक-ज्ञान पास, और आध्यात्मिक ज्ञान बहुत दूर है । वे दोनों वेद में लिपे हुये हैं ।
( २ ) ब्रह्मचारी अपने तपोऽनुष्ठान से उन दोनों को अपने अधिकार में कर लेता है ।
( ३ ) इन दोनों के रहस्य को ब्रह्मज्ञानी पुरुष ही समुचित जानता है ।
'भौतिक-ज्ञान' से भी कठिन 'ब्रह्म-ज्ञान' है । आचार्य उन दोनों को, अपने शिष्य को बेवाध्ययन से सिखला देता है । वह