ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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( ३ ) और सब सदगुण इस अमृत (न मरनेवाला पदार्थ) के सङ्ग में रहते हैं ।
ब्रह्मचर्य ही विद्वान् लोगों का उच्च तथा उत्साह-दायक ध्येय है । वे इसका पूर्ण रूप से पालन करते हैं । इसका सद्भाव उनके उन्नत बनाता है । इससे उनके हृदय में सब से उत्तम, ब्रह्मज्ञान का उदय होता है, और ब्रह्मज्ञान के प्राप्त होने से उन के अन्तर्गत सभी अच्छे गुण अपने आप स्थायी रूप से रहने लगते हैं । अर्थात् उनके सदभ्यस्त विचार स्वलिप्त नहीं होने पाते ।
( २४ )
ब्रह्मचारी ब्रह्म ज्ञानद्वु विभ्रमिन् । तस्मिन्नेवा श्रुधि विश्वसे समोता । प्राणापानी जनयन्नाह्व्यान् वाचं मनो हृदयं ब्रह्म मेधाम् ॥
( १ ) ब्रह्मचारी कमकीले ब्रह्म को भरता है । ( २ ) उसमें सब देवलोग रहते हैं और ( ३ ) प्राण, अपान, न्यान, वाचा, मन, ज्ञान और मेधा उत्पन्न करता है ।
( १ ) ब्रह्मचारी उत्कृष्ट ब्रह्मचर्य का पालन करता है ।
( २ ) इस से सभी संसार के सदगुण उस में एकत्र हो जाते हैं ।
( ३ ) और वह अपने अनुष्ठान से प्राणों, वाचा-शक्ति, मन, हृदय, ज्ञान और बुद्धि को पुष्ट करता है ।
वीर्य ही परमेश्वर का तात्विक रूप है । ब्रह्मचारी उसे अपने शरीर में धारण करता है । इस चर्या से उसके सभी दिव्य गुणों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार वह अपने तप के प्रभाव से समस्त शारीरिक और मानसिक शक्तियों को प्रबल और संयमित बनाता है ।
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अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य-सूक्तः
( २५ )
चक्षुः श्रोत्रं यशो श्रुत्मासु धेयान्ते रेतो लोहितं मुद्रम् ॥
हमलोगों को चक्षु, श्रोत्र, यश, अत्र, रेतस, लोहित और वदर दो ।
हे ब्रह्मचारी ! हमको सुष्ठि, सुश्रवण, कीर्ति, प्राण, वीर्य, रक्त और पालन-पोषण करने की शक्ति दो । ब्रह्मचर्य के अधीन विश्व की वाण तथा आभ्यन्तर सभी शक्तियाँ होती हैं । परमात्मा भी ब्रह्मचारी है और ब्रह्मचारी भी परमात्म-रूप है । इसीलिये वसंत इन सब दिव्य शक्तियों की याचना की गई है । हे परमात्मा के अंशभूत ब्रह्मचारी ! तुम जनता में सुख और शान्ति के बढ़ाने के लिये नाना प्रकार के सदाचार-सम्बन्धी उपदेश करो, तथा ऐसे यज्ञ बताओ, जिनसे कि संसार के अमङ्गल-कारी अव-गुणों का नाश हो !
( २६ )
तानि कल्पहू ब्रह्मचारो सलिलस्य पृष्टे तपोऽतिष्ठत्प्यमानः समुद्रे । स स्नातो बभ्रुः विंगलः पृथिव्यां वह्य रोचते ॥
( १ ) ब्रह्मचारी उन सबों का उपक्रम करता है ( २ ) वह समुद्र में तप होने वाला जल के पीठ पर तप करता है । और ( ३ ) वह स्नान कर के अत्यन्त तेज वाला होकर, पृथिवी में अच्छा माना जाता है ।
( १ ) ब्रह्मचारी ऊपर कहे, गये, उन सब सदगुणों और विश्व-मुखाय के उपदेशों की योजना करता है ।
( २ ) वह ज्ञान-रूपी सागर में अपने को तपा कर, सुख रूपी जल के तीर पर अपने व्रत का अनुष्ठान करने लगता है ।
अष्टाध्याय-विज्ञान
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(३) और वह तेजस्वी स्नातक बनकर संसार में अपने सद्गुणद्वारा से सम्मानित होता है।
ब्रह्मचारी आचार्य के समीप रहकर, विद्याध्ययन से नाना प्रकार की शारीरिक और मानसिक शिक्षाएँ प्राप्त करता है। वह अत्यन्त परिश्रम से ज्ञानार्जन कर के सुख के समीप पहुँचता है। वह अपने को योग्य बना कर अपनी परम श्रेष्ठता, योग्यता और गौरव-गारिमा से संसार में शोभित होता है। वह जनता का हित करता है, और उसकी जनता उचित पूजा करती है।
वस्तुतः वीर्य-रक्षण से ही आत्मिक शक्तियाँ विकसित हो सकती हैं। अवियंवान पुरुष को कभी जीवन में सफलता नहीं मिलती। जो अपना कल्याण चाहने वाले पुरुष हैं, उन्हें इस वैदिक सूक्त की शिक्षाओं पर पूर्ण श्रद्धा और विश्वास रखना चाहिये। यदि वे उनके अनुकूल चलने का प्रयत्न करेंगे, तो उनके जीवन में सुख ही सुख देखलाई पड़ेगा। वेद भगवान् का कथन कभी असत्य नहीं हो सकता। इसे निश्चय समझो !
(अथर्ववेद ११, ४, १०-२६)
जिनमें ऊपर के मन्त्रों की विशेष व्याख्या देबनी हो, वे लेखक की 'हिन्दी में अष्टाध्याय-सूक्त' नाम की पुस्तिका पढ़ें।
द्वितीय खण्ड
१—ब्रह्म-वन्दना
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च।
नमः शङ्कराय च मयस्कराय च।
नमः शिवाय च शिवतराय च ॥
( खुर्दोद श० १६ म० ४१ )
सुख-स्वरूप और आनन्दमय परमात्मा को नमस्कार है— कल्याणकारी और मोक्षदाता प्रभु को नमस्कार है। और मङ्गल- कारी तथा अत्यन्त सुख देने वाले को नमस्कार है।
हे प्रभो ! तुमने अपने योग बल से कामदेव को दण्ड कर दिया था। तुम्हारे योगयुक्त चित्त में विकार स्थान न पा सका। हम लोग तुम्हारी इस लिये उपासना करते हैं कि हमारे हृदय में काम-विकार उत्पन्न न हो। तुम हमें ऐसा बल दो कि हम ब्रह्म- चर्य का पालन करें, जिससे कि तुम्हारे स्नेह-भाजन बनें।
अशिव विचारों से ही ब्रह्मचर्य का नाश होता है। जब हम अपने को शिव-स्वरूप समझेंगे, तो फिर हमारे ऊपर कामदेव अपना बाण न चला सकेगा। यदि ऐसा करेगा, तो उसका सिंहास ही पराजय होगा। हम सुख और शान्तिदायक विविध नामों से तुम्हारी उपासना इसलिये करते हैं कि हमारा मङ्गल हो। विना तुम्हारी अनुकम्पा के हमारा तप ब्रह्मचर्य सिद्ध नहीं हो सकता।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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अतः कल्याण की कामना से हमें अपने गुणों को प्रदान कर अपने नाम का सार्थक करा !
२—त्रिविध ब्रह्मचर्य
कायेन मनसा वाचा, सर्वाचस्थासु सर्वदा । सर्वत्र मैथुन-त्यागो, ब्रह्मचर्यं प्रचक्षते ॥
(महाशुभि याज्ञवल्क्य )
शरीर, मन और वचन से सब अवस्थाओं में, सर्वदा और सर्वत्र मैथुन (सम्भोग) त्याग के नाम को ब्रह्मचर्य कहा जाता है । महाशुभि याज्ञवल्क्य के मत से कायिक, मानसिक और वाचिक—ये तीन प्रकार के ब्रह्मचर्य होते हैं । इन तीनों के समूह का नाम 'सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य' है । अतएव इन तीनों का पालन करने वाला पुरुष ही सम्पूर्ण ब्रह्मचारी होने के योग्य है ।
१—कायिक ब्रह्मचर्य—हाव, भाव, एवं कटाक्ष, लुम्बन, आलिङ्गन, अङ्गमर्दन तथा उपस्थेन्द्रिय के सञ्चालन से सब प्रकार प्रयुक्त रहने को कहते हैं ।
२—मानसिक ब्रह्मचर्य—विषय-चिन्तन, सम्भोग के मनोरथ, कामोद्दीपन साधनों की भावना, एवं विकारों के संग्रह को भली भाँति त्याग देना ही माना गया है ।
३—और वाचिक ब्रह्मचर्य—श्रेष्ठात्माप, विषय सम्बन्धों वर्या, शुद्ध सन्भावण एवं हृदय में काम-विकार उत्पन्न करने वाली चालुर्य-पूर्ण कथा से विरक्त रहने का नाम है ।
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निर्विघ्न ब्रह्मचर्य
वहुत से लोग ऐसे हैं, जो कायिक ब्रह्मचर्य का पालन करने पर भी मानसिक और वाचिक का पालन नहीं कर सकते। वे समझते हैं कि कायिक पाप ही पाप है। मानसिक और वाचिक पाप, पाप नहीं। यही कारण है कि वे कुछ ही दिनों में कायिक ब्रह्मचर्य को भी छोड़ बैठते हैं। हमारे विचार से कायिक ब्रह्मचर्य का रूप बहुत स्थूल है। इसके पालन में इतनी कठिनाता नहीं, जितनी कि मानसिक और वाचिक के पालन में है।
हमारे विचार से 'मानसिक' ब्रह्मचर्य उत्तम, 'वाचिक' मध्यम और 'शारीरिक' अधम है। मन, वचन तथा कर्म का आपस में बड़ा घनिष्ट सम्बन्ध है।
कुछ लोग ऐसे हैं, जो विचारते हैं कि वाचिक ब्रह्मचर्य में क्या धरा है। उसके छोड़ने से कुछ हानि नहीं हो सकती। ऐसी धारणा कर, वे वास्तव में मूर्खता करते हैं। वाचनिक ब्रह्मचर्य के बिगड़ने से कायिक ब्रह्मचर्य भी निस्सन्देह नष्ट हो जाता है। जा वाचनिक ब्रह्मचर्य का पालन नहीं कर सकता है, भला वह कायिक को पालन कैसे कर सकेगा ?
वहुत से लोग मनोविज्ञान का महत्व न जान कर, मानसिक ब्रह्मचर्य की अवहेलना करते हैं। वे यह नहीं जानते कि मनकी ही 'मेरुश्या-से पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ काम करती हैं। वह इस शरीर का राजा है। वह जिस अवयव को चाहता है, उसे उसके विषय में तत्काल लगा देता है।
अब हम आगे के लेख में मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता दिखा देने की चेष्टा करेंगे।
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३—मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता
यन्मनसां मनुते तद्वाचावदति, यद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति, यत्कर्मणा करोति तदस्मिन्मपद्यते ।
( यजुर्वेदब्रह्मण )
जिसका मन में धिन्तन किया जाता है, वही बाणी से निकलता है, जो कुछ बाणी से निकलता है, वही कर्म किया जाता है, और जैसा कुछ कर्म किया जाता है, वैसा उसका फल भी मिलता है ।
ऊपर के मन्त्र में मन की स्पष्ट रूप से प्रधानता दिखाई गई है। मन का ही अधिकार वचन और कर्म पर है। मानसिक विकार ही वाचिक और कायिक विकारों का मूल है । अतएव मानसिक ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला पुरुष ही वाचिक और कायिक ब्रह्मचर्य पाल सकता है । बहुत उचित कहा गया है:—
“मन एव मनुष्याणां, कारणं बन्ध-मोक्षयोः”
मनुष्य के बन्धन और मोक्ष का कारण, उसका मन ही है । सब से पहले मन की ही साधना की जाती है । जिसका मन सद्य गया है, उसका वचन और शरीर पर भी अधिकार हो जाता है । जिसका मानसिक ब्रह्मचर्य छूट जाता है, उसका वाचिक और कायिक भी स्वयं छूट जाता है । इसीलिये मानसिक ब्रह्मचर्य ही का पालन करना प्रधान है । इसी के द्वारा कुछ दिनों में वाचिक और कायिक ब्रह्मचर्य भी स्वयं सद्य जाता है ।
मानसिक ब्रह्मचर्य के सम्बन्ध में एक पौराणिक आख्यायिका
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मानसिक ब्रह्मचर्य की प्रधानता
है। वह हमारे विचार से रहस्य मयी और शिन्ना-श्यायिनी है। हम उसे पाठकों के हितार्थ यहाँ देना उचित समझते हैं:—
एक समय पितामह ब्रह्माजी तपोवन में जा कर तपस्या करने लगे। इत अनुष्ठान में उन्हें लगभग ३००० वर्ष बीत गये। यह दशा देख कर देवों के राजा इन्द्र को अत्यन्त द्वेष और भय हुआ। उन्होंने समझा कि कहीं ऐसा न हो कि तप सिद्ध होने पर, हमारे इन्द्रासन की मर्यादा हीन हो जाय। अतः उन्होंने तिलोत्तमा नाम की एक अस्सरा को तपोबन्ध करने की मेजा। वह अस्सरा तपोवन में आकर अपना हाथ, भाव और कदाच करने लगी। यह दृश्य देख कर ब्रह्माजी के मन में विकार उत्पन्न हो गया। वह जिधर-जिधर जाती थी, वे भी षष्ठर-वृषर काम-टष्टि से उसे देखते थे। इसके अन्तर्त वह इन्द्र के पास लौट आई। पर ब्रह्मा जी अपने मानसिक ब्रह्मचर्य से पतित होने के कारण, अपने तीन सहस्र वर्ष की तपस्या के फल से हाथ धो बैठे !
इस आख्यायिका के पढ़ने से पाठक समझ गये होंगे कि मानसिक ब्रह्मचर्य ही प्रधान ब्रह्मचर्य है। जब ब्रह्माजी जैसे दिव्य पुरुष को मानसिक ब्रह्मचर्य के छोड़ने से पतित होना पड़ा, तो फिर हमलोग तो साधारण जीव हैं। अतः मानसिक ब्रह्मचर्य का भली भाँति पालन करने वाला ही सच्चा ब्रह्मचारी है।
हम ने जहाँ तक कथा-पुराणों में देखा है, सर्वत्र ही इस मानसिक ब्रह्मचर्य को कायिक और वाचिक का मूल माना गया है।
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४—ब्रह्मचर्य से विद्याध्ययन
“विद्यायां विन्दतेऽमृतम् ।
( शुद्धकोमानिषत् )
विद्या के प्रभाव से परमानन्द मिलता है ।
ब्रह्मचर्येण विद्या, विद्यायां ब्रह्मलोकम् ।
( अथर्व-संहिता )
वीर्य-रक्षा के द्वारा ही विद्या प्राप्त होती है और विद्या के मिलने से ही मनुष्य ब्रह्मलोक का सुख पाता है ।
ऊपर के मंत्र में यह बात कही गई है कि ब्रह्मचर्य ही विद्या का मूल है । बिना ब्रह्मचर्य के विद्या की उपलब्धि नहीं हो सकती, जो वास्तव में सत्य है ।
ब्रह्मचर्य और विद्या में वृद्ध और शाखा के समान सम्बन्ध है । यही कारण है कि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही विद्या के अध्ययन करने का नियम प्रचलित किया गया था । ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य की अवस्था में ही वेद-वेदाङ्गों का अभ्यास कर लेते थे । और जब तक विद्या प्राप्त नहीं हो जाती थी, गृहस्थाश्रम में पैर नहीं घरते थे ।
जो विद्या ब्रह्मचर्य के द्वारा गृहीत होती है, वह कभी खंखलित नहीं होती ! वीर्य के प्रभाव से ज्ञान के गूढ़ तत्वों का शीघ्र ही हृदयङ्गम हो जाता है । विद्यार्थी की धारणा-शक्ति सदा जागृत और तीव्र रहती है, जिससे कि वह थोड़े ही अभ्यास से विशेष लाभान्वित होता है । ओ लोग ब्रह्मचर्ययुक्त विद्याध्ययन करते
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ब्रह्मचर्य से विद्याध्ययन
हैं, वे ही उच्च तथा यशस्वी विद्वान् बन सकते हैं और उन्होंने की विद्या में वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, तथा गणित सम्बन्धी नवीन-नवीन आविष्कार करने की शक्ति उत्पन्न होती है।
“विद्यार्थं ब्रह्मचारी स्यात्।”
( महात्मा विदुर )
विद्याध्ययन करने के ही लिये ब्रह्मचारी बनना चाहिये। इसी सिद्धान्त को लेकर बहुत से विद्यार्थी आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
अब हम पाठकों को ब्रह्मचर्य से विद्या के अध्ययन में क्यों सफलता मिलती है ? इस सम्बन्ध की एक रोचक आख्यायिका सुनाते हैं:—
एक दिन देवर्षि नारद अमरावती में इन्द्र के पास उनसे मिलने गये। वहाँ वे उन से मिल कर बड़े प्रसन्न हुये। इन्द्र को किसी स्थान की, वेद की कई ऋचायें मूल गई थीं। अतः उन्होंने चतुरता से पूछा कि असुक स्थान की ऋचा कैसे है ? इस पर नारद जो ने सखर उन मन्त्रों का पाठ कर सुनाया। तब इन्द्र को आश्चर्य हुआ और उन्होंने कहा कि अब रहने दीजिये, काम हो गया। मैं तो आपकी परीक्षा ले रहा था। यह बात सुन कर, नारद जो अत्यन्त रुष्ट हुए और उन्होंने कहा कि तुम्हें एक ब्रह्मचारी की परीक्षा करने में लज्जा नहीं आई ! भला ब्रह्मचारी की विद्या कभी तुम्हारी तरह नष्ट हो सकती है। सुक से कहीं की भी ऋचा पूछ सकते हो ! यदि फिर कभी ऐसा दुस्साहस कर, किसी ब्रह्मचारी की परीक्षा करोगे, तो अवश्य ही
ब्रह्मचर्य विधान
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इन्द्रासन से पसित हो जाओगे ! इस बात से इन्द्र भय के मारे कॉपने लगे और बड़ी प्रार्थना कर चूमा माँगी और नारद जी नहीं से चले गये ।
५—ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन
“वल्लेन वे पृथिवी तिष्ठन्ति, बल्लेनान्तरिक्षम् ।” “वीर्यमेव बलम्”—“बलमेव वीर्यम् ।”
(उपनिषत्.)
बल से ही पृथ्वी उठरती है और बल से ही अन्तरिक्ष भी उठरा हुआ है । वीर्य ही बल है । और बल का नाम ही वीर्य है । उपनिषदों में बल और वीर्य का एक साथ वर्णन कर, दोनों में कैसी अच्छी समता दर्शाई गई है !
वास्तव में ब्रह्मचर्य ही संसार की समस्त शक्तियों का केन्द्र है । आज तक संसार में जितने बड़े-बड़े योद्धा और बलवान हो गये हैं—जितने शूर-वीर पराक्रमी हो गये हैं और जितने विजेता और रण-कौशल जानने वाले हुये हैं, सब की ब्रह्मचर्य का आश्रम लेना पड़ा है । बिना वीर्य की रक्षा के शारीरिक तथा मानसिक बल किसी को नहीं प्राप्त हो सकता । जो योद्धा ब्रह्मचर्य का नाश कर देता है, वह युद्ध-क्षेत्र में जाकर, कभी जय नहीं पा सकता !
प्राचीन समय में क्षत्रिय-कुमारों को भी ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था । जब तक वे युद्ध-विद्या में निपुण और शारीरिक बल में पराक्रमी नहीं हो जाते थे, उन्हें वीर्य-रक्षा करनी
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ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन
पड़ती थी। युद्ध में अनेक योद्धाओं और वीरों को नीचा दिखलाने पर ही उनका स्वयंवर विवाह होता था।
जो पुरुष बल का अर्जन करना चाहें, उसके लिये ब्रह्मचर्य हो एक मात्र सच्चीवनी-चट्टी है। धिना वीर्य के शक्ति स्थिर नहीं हो सकती।
अब हम अपने पाठकों को ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन करने वाले महाभारत के एक महावीर की कथा सुनाते हैं:—
महाभारत के भीष्म पिता को आज भी हिन्दू-जाति नहीं भूली है। उनसे वद कर वीर-पराक्रमी कदाचित ही कोई रहा हो। उन्होंने अपने पिता के लिये ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा की थी। इस व्रत के पालन से उनका शरीर वज्र के समान हो गया था। वीर्य-रक्षा के कारण ही वे युद्ध में कभी भी पराजित नहीं हुये। उनका सारा जीवन बल की ही उपासना में व्यतीत हुआ। युद्ध होने पर भी महाभारत के महायुद्ध में ९ दिन तक पाण्डव-सेना के वहे-वहे महारथी, शूर-वीर तथा नाना शास्त्र चलाने वाले निपुण लोगों के दाँत खट्टे करते रहे। विपत्तियों के दल में त्राहि! त्राहि! का शब्द होने लगा। वीरवर अर्जुन और नीतिज्ञ श्रीकृष्ण की भी बुद्धि चकर खाने लगी। पितामह को यह शक्ति कष्टों से प्राप्त हुई थी? इसका एक मात्र उत्तर यह है कि उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य द्वारा! जो कि उन्हें अत्यन्त प्रिय था, और जिस के लिये उन्होंने सांसारिक समस्त सुखों को तिलाञ्जलि दे दी थी।
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ब्रह्मचर्य से सम्पत्ति-सेवा
“नाऽनाश्रान्ताय श्रीरक्ति ।”
(ऐतरेय-ब्राह्मण)
बिना पुरुषार्थ के धन नहीं मिलता ! लक्ष्मी पुरुषार्थ के वश में सदा रहती है ।
“धर्मार्थे काम मोक्षार्थामारोग्य मूल मुक्तामम् ।”
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उत्तम साधन आरोग्य ही है । एक आरोग्य के अधीन सब कुछ है ।
ब्रह्मचर्य से ही प्रसन्न धन प्राप्त किया जा सकता है । न्यभिचारी पुरुष का धन नष्ट हो जाता है । ब्रह्मचारी अपने नियम का बड़ा टूट होता है । वह अपने संयम-बल से सम्पत्ति एकत्र करता है । उसमें सतत परिश्रम का अभ्यास होता है । जो लोग ब्रह्मचर्य का नाश कर देते हैं, वे सम्पत्ति की रक्षा नहीं कर सकते । बड़े-बड़े धनी जब तक ब्रह्मचर्य-रत रहे हैं, तब तक उनकी उन्नति होती गई है । लक्ष्मी सदा ब्रह्मचारी तथा वयोगी की ओर रहती है । यदि धनवान् बनना हो और अपने सन्निध धन को सुरक्षित करना हो, तो वीर्य-रक्षा पर पूर्ण ध्यान दो !
ब्रह्मचर्य अनेक प्रकार की सेवाओं का भी मूल कारण है । देश, जाति, समाज, राज्य और आत्म-सेवायें बिना ब्रह्मचर्य के निभ नहीं सकतीं । सेवाओं का आधार आरोग्य है । शरीर के स्वस्थ रहने पर ही मनुष्य सेवा में सब प्रकार से लग सकता है । वह स्वास्थ्य वीर्य-संरक्षण के अधिकार में है । ब्रह्मचारी पुरुष औरों की अपेक्षा बहुत कार्य कर सकता है । आज तक जितने
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ब्रह्मचर्य से अपूर्व मेधा
प्रकार के सेवक हुए हैं, सबको इस अमूल्य सिद्धान्त की प्रतिष्ठा करनी पड़ी है। धर्म-सेवक, देश-सेवक, जाति-सेवक तथा राज्य-सेवक—सब ब्रह्मचर्य की शरण में रह कर ही अपने मनोरथ सफल-भूत कर सके हैं। इसलिये जो सेवा-कार्य करना चाहें, वह इस ब्रह्मचर्य-बल को अवश्य प्राप्त करें।
७—ब्रह्मचर्य से अपूर्व मेधा
“मेधा देवैस्सर्वै रुपास्या।”
(श्रुति)
मेधा वह शक्ति है, जिसकी सभी विद्वान् लोग उपासना करते हैं।
“मेधा दिव्या वरा शक्ति, ब्रह्मचर्येण युज्यते।”
मेधा वह पवित्र और श्रेष्ठ शक्ति है, जो वीर्य-रक्षण के द्वारा ग्रहण की जाती है।
मेधा वास्तव में ईश्वरीय-शक्ति है। इसके बिना सब न्यर्थ है। प्राचीन समय में हमारे पूर्वज आर्य लोग, इसकी बड़े परिश्रम से उपासना करते थे। इसके लिये देवताओं से वर प्राप्त करते थे। इसके लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर देते थे।
इस मनुष्य-शरीर में सतिष्क सब से श्रेष्ठ स्थान माना गया है। वह मेधा-शक्ति इसी विहार-क्षेत्र में विचरण करती है। ब्रह्मचारी पुरुषों की मेधा अत्यन्त तीव्र होती है। उनके सतिष्क में सदैव उन्नत विचार-प्रवाह प्रवाहित होता रहता है।
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वीर्य-रक्षा से मस्तिष्क बहुत प्रबल हो जाता है। निर्बल मस्तिष्क की अपेक्षा बलवान मस्तिष्क अधिक कार्य कर सकता है। यह बात बहुत ही सत्य है कि उत्तम मस्तिष्क में ही उत्तम मेधा रह सकती है। जो पुरुष अपने वीर्य को सुरक्षित रखता है, उसी का मस्तिष्क बलिष्ठ और मेधा तीव्र हो सकती है।
यह बात हम बहुत से ग्रन्थों में देखते हैं कि हमारे ऋषि-मुनि बड़े मेधावी और विद्वान् होते थे। बड़े से बड़े ग्रन्थ को एक बार सुन कर ही खरगण रखते थे। उनके पास नाना विचारों और कलायें थीं। गुरु लोग अपने विचारियों को गूढ़ से गूढ़ ज्ञान की शिक्षायें देते थे और वे बिना परिश्रम के उनके वाक्य तक कष्टस्य कर रखते थे। बहुत से लोग बहुश्रुत होते थे। उनका यही काम था कि वेदों तथा शास्त्रों को सुनकर ही पण्डित हो जाते थे। उन्हें पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं होती थी। इसीलिए वे बहुश्रुत कहें जाते थे और लोग उनकी बड़ी प्रशिक्षा करते थे।
ऊपर की बातों को जान कर यह प्रश्न मन में उठता है कि उनको क्या ऐसी विलक्षण शक्ति प्राप्त थी, जिससे कि वे ऐसा कर सकते थे? आजकल की तो यह दशा है कि सौ बार का रटा हुआ एक स्त्रीक भी भूल जाता है। उन्हें दिव्य मेधा-शक्ति प्राप्त थी ! यह मेधा-शक्ति उन्हें मिलती कहाँ से थी? उनके ब्रह्मचर्य के गताप से। वे लोग ब्रह्मचर्य का इसीलिए पालन करते थे कि उनकी मेधा इतनी तीव्र थी, जिससे कि जिस विद्या का वे अध्ययन करें, वह स्थायी रूप से बनी रहे। इस विषय में एक आख्यायिका नीचे दी जाती है:—
केशरी-कुमार हनुमान का नाम जगत्प्रसिद्ध है। वे बाल-
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ब्रह्मचर्य से दीर्घायु
ब्रह्मचारी थे। एक दिन वे सूर्य नारायण के पास वेद पढ़ने के लिये गये। उन्होंने उनसे वेद पढ़ने की प्रार्थना की। इस पर उन्होंने हनुमान से कहा कि हमें पढ़ाने में कोई आपत्ति नहीं, पर मैं जो कुछ कहूँगा, एक ही बार, कदाचित् तुम उसे ब्रह्मण न कर सकोगे ! फिर तुम्हें हमारे रथ के साथ खलटा चलना होगा। यह बात हनुमान ने मान ली और सूर्य भगवान के तीव्र घोड़ों के रथ के आगे चलते पाँच विद्या पढ़ते हुए अस्ताचल तक गये। फिर सूर्य ने उनसे सुनाने को कहा। उन्होंने सत्वर जो कुछ पढ़ा था, कह सुनाया। सूर्य ने उनको अपूर्व सेवा की बड़ी प्रशंसा की और उनको आशीर्वाद देकर विदा किया।
८—ब्रह्मचर्य से दीर्घायु
“दीर्घायु ब्रह्मचर्यया !”
( रुक्मि )
ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन करने से मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त होती है।
यो विभर्ति दावायाणं हिरण्यं, स देवेषु कृणुते दीर्घं मायुः, स मातृषेषु कृणुते दीर्घमायुः ।
( गवर्धन )
जो अपने शरीर में अनुपम वीर्य को रक्षित रखता है, वह विद्वानों में दीर्घायु प्राप्त करता है—वह साधारण लोगों में भी दीर्घजीवी होता है।
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अपने में वीर्य भरने वाला पुरुष, ज्ञानी हो या अल्पज्ञ, उसी दोनों अवस्थाओं में दीर्घजीवन प्राप्त होता है ।
न तद्रक्षसि पिशाचाश्चरन्ति, देवानां भोजः प्रथमजं होतत् ।
( यजुर्वेद )
जो पुरुष वीर्य की रक्षा करता है । उसे राक्षस और पिशाच नहीं सताते । यह वीर्य विद्वान् लोगों का आत्मतेज या दिव्य गुणों का सारंश है । यह उन में प्रथमतः उत्पन्न होता है ।
‘राक्षस’ नाम है पापी का और ‘पिशाच’ दुष्ट को कहते हैं । एक ब्रह्मचारी पुरुष को पापी और दुष्ट का कुछ भी भय नहीं रहता । वे इसके प्रभाव से स्वयं भयभीत रहते हैं और किसी प्रकार का कष्ट नहीं दे सकते । वीर्य की रक्षा करने वाले से, पापी और दुष्ट का, उसे नष्ट करने में, कुछ भी वश नहीं चलता ।
यह बात सभी लोग जानते हैं कि ‘राक्षस’ और ‘पिशाच’ के लगने से मनुष्य का आयुर्बल क्षीण हो जाता है । इसीलिए लोग उनसे बचने का उद्योग करते हैं । पापी और दुष्ट पुरुष भी मनुष्य के आचरण को भ्रष्ट कर देते हैं । इनके संपर्क से आयुर्बल का हास होला है । जो लोग सच्चे बीर्य-रक्षक हैं, वे इनसे बचे रहते हैं ।
व्यभिचार से मनुष्य का आयुर्बल क्षीण हो जाता है । मार्चीन अथवा अर्वाचीन समय में एक भी व्यभिचारी पुरुष दीर्घजीवी होता नहीं देखा गया । इतिहास में दीर्घजीवी पुरुषों के जीवन-चरित के पढ़ने से यह बात पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुकी है कि ब्रह्मचर्य के पालन से ही उनको दीर्घजीवन प्राप्त हुआ था ।
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ब्रह्मचर्य से दीर्घायु
दीर्घजीवन का मूल कारण वीर्य-रक्षण है। जिसका जितना ही पुष्ट वीर्य है, वह उतना ही अधिक दिनों तक जीवित रह सकता है।
ब्रह्मचर्य में वीर्य-रक्षा प्रधान है। वीर्य के रक्षित होने पर ओज की वृद्धि होती है। ओज की बढ़ती के ही भीतर जीवनी-शक्ति है। इसी अद्भुत शक्ति से मनुष्य का शरीर सुदृढ़ और स्वस्थ रहता है। शरीर की सुदृढ़ता और स्वस्थता के ही ऊपर दीर्घायु-अवलम्बित है।
कहने का अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य के पालन से ही दीर्घजीवन प्राप्त हो सकता है। जो जितना दीर्घजीवी होना चाहता है, वह उतना ही वीर्य की रक्षा करे। वीर्य का व्यय ही जीवनी-शक्ति का प्रधान नाशक है।
कुछ लोगों का कहना है कि सतयुग, त्रेता और द्वापर में मनुष्य का आयुर्वल विशेष होता था, सो अब कलियुग के कारण कम हो गया है। इस बात को हम मानते हैं, पर इसके साथ यह भी था कि अन्य युगों में ब्रह्मचर्य का पालन भी विशेष रूप से किया जाता था, जो दिन पर दिन बढ़ता ही गया और कलियुग में नाम ही नाम रह गया। यदि इस समय भी ब्रह्मचर्य का विधिवत पालन हो, तो अब भी दीर्घजीवी पुरुष हो सकते हैं। यह कोई विचित्र बात नहीं! अब हम कुछ दीर्घजीवी पुरुषों के नाम और उनकी अवस्था की तालिका नीचे लिखते हैं। इस तालिका से पाठक स्वयं जान जायेंगे कि ये पुरुष किस प्रकार के सत्युष, धर्मनिष्ठ और सदाचारी थे:—
भीष्म-पितामह १७०, महर्षिऋष्य १५७, वसुदेव १५५,
ब्रह्मचर्य-विधान
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भगवान् बुद्ध १४०, भुतराष्ट्र १३५, श्रीकृष्ण १२६, रामानन्द गिरि १२५, महात्मा कबीर १२०, युगराज लोहकार ११५, महाकवि भूपण १०२, स्वामी सच्चिदानन्द, १०० महाकवि मतिराम ९९, गोस्वामी तुलसीदास ९१, यतीन्द्रनाथ ठाकुर ८५ और भक्त वर सुरदास ८० वर्षों तक जीवित रहे ।
८० से लेकर १०० वर्ष तक की अवस्था के इस समय भी कई पुण्यतमा विद्यमान हैं । लेखक ने स्वयं कई ऐसे स्त्री वषों के पुरुषों को देखा है, जिनकी नेत्र-व्योति, शारीरिक स्थिति और स्वरण-शक्ति उत्तम, दृढ़ तथा तीव्र थी । उनसे तथा उनके जानने वालों से पढ़ने पर यह बात जानी गई कि वे बाल-ब्रह्मचारी या नियमपूर्वक वीर्य-रक्षक थे ।
श्रीमद्भागवत के अनुसार कलि-काल में भी मनुष्य के आयुष्य का परिसाण १२० वर्षों का है । इससे पूर्व मरने वाले अकाल मृत्यु से मरते हैं । ब्रह्मचर्य-व्रत से हीन होने वाले ही लोग इस अकाल मृत्यु के प्राप्त होते हैं । वीर्य का विधिवत् रक्षा करने वाला पुरुष ही अपने आयुष्य का पूर्ण उपयोग कर सकता है ।
अथर्ववेद में १०१ प्रकार की मृत्युयें ( शरीर से आत्मा के प्रयत्न होने की आवश्यकतायें ) मानी गई हैं । उनमें से १०० को अकाल मृत्यु हैं । पूर्ण मृत्यु उनमें से १ ही है । इस अनियम मृत्यु से मरने वाला पुरुष ही भाग्यवान है और उसी की सदगति होती है । जो लोग अकाल मृत्यु से मरते हैं, वे मोक्ष के अधिकारी नहीं होते । इसलिये जो लोग अकाल मृत्यु से बचना चाहते हैं, उन्हें ब्रह्मचर्य का अवश्य पालन करना चाहिये !
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ब्रह्मचर्य से उत्साह-साहस
६—ब्रह्मचर्य से उत्साह-साहस
उत्साह और साहस के बिना संसार का एक काम भी सुचारु-रूप से सम्पादित नहीं हो सकता। इन दोनों का निवासस्थान हृदय है। जिसका हृदय जितना ही बलिष्ठ है, वह पुरुष उतना ही उत्साही और साहसी हो सकता है। हृदय का बलवान होना ब्रह्मचर्य के अधीन है। जिसने वीर्य की रक्षा की है, उसमें उत्साह और साहस की छाया हम देख सकते हैं। वीर्य के बिना हृदय कभी पुष्ट नहीं हो सकता। यह बात प्रायः देखने में आती है कि व्यभिचारी पुरुष अतुत्साही और असाहसी होते हैं। अब पाठक समझ गये होंगे कि उत्साह और साहस का एक मात्र मूल वीर्य है—ब्रह्मचर्य का पालन है।
पवन-पुत्र हनुमान जानकी को खोजने के लिये समुद्र पार कर लङ्का में पहुँचे। वहाँ उन्होंने बहुत दृढ़ता, पर जानकीजी का कुछ भी पता न चला। तब वे बहुत घबड़ाये और बैठ कर विचारने लगे कि यदि जानकी नहीं मिली, तो मैं जी नहीं सकता। मेरे मरने पर सुमित्रा भी मेरे शोक में मर जायँगे। इस प्रकार राम-लक्ष्मणादि सभी एक के शोक में दूसरे मर जायँगे। इन सब बातों के पश्चात् उनको अपने ब्रह्मचर्य का ध्यान हुआ और इस कारण से उनके हृदय में उत्साह का पुनः सञ्चार हो उठा। उन्होंने विचार कि कठिन से कठिन कार्य उत्साह से सम्पादित हो सकता है। वाल्मीकि-रामायण में उन्होंने उत्साह की बड़ी प्रशंसा की है। अन्य में इसी उत्साह के कारण उन्होंने जानकी को खोज कर ही शांति ली।
भीष्म पितासह काशिदास की अस्त्रा, अम्बिका और अम्बा-