ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मचर्य विधान
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इन्द्रासन से पसित हो जाओगे ! इस बात से इन्द्र भय के मारे कॉपने लगे और बड़ी प्रार्थना कर चूमा माँगी और नारद जी नहीं से चले गये ।
५—ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन
“वल्लेन वे पृथिवी तिष्ठन्ति, बल्लेनान्तरिक्षम् ।” “वीर्यमेव बलम्”—“बलमेव वीर्यम् ।”
(उपनिषत्.)
बल से ही पृथ्वी उठरती है और बल से ही अन्तरिक्ष भी उठरा हुआ है । वीर्य ही बल है । और बल का नाम ही वीर्य है । उपनिषदों में बल और वीर्य का एक साथ वर्णन कर, दोनों में कैसी अच्छी समता दर्शाई गई है !
वास्तव में ब्रह्मचर्य ही संसार की समस्त शक्तियों का केन्द्र है । आज तक संसार में जितने बड़े-बड़े योद्धा और बलवान हो गये हैं—जितने शूर-वीर पराक्रमी हो गये हैं और जितने विजेता और रण-कौशल जानने वाले हुये हैं, सब की ब्रह्मचर्य का आश्रम लेना पड़ा है । बिना वीर्य की रक्षा के शारीरिक तथा मानसिक बल किसी को नहीं प्राप्त हो सकता । जो योद्धा ब्रह्मचर्य का नाश कर देता है, वह युद्ध-क्षेत्र में जाकर, कभी जय नहीं पा सकता !
प्राचीन समय में क्षत्रिय-कुमारों को भी ब्रह्मचर्य का पालन करना पड़ता था । जब तक वे युद्ध-विद्या में निपुण और शारीरिक बल में पराक्रमी नहीं हो जाते थे, उन्हें वीर्य-रक्षा करनी