ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य से विद्याध्ययन
हैं, वे ही उच्च तथा यशस्वी विद्वान् बन सकते हैं और उन्होंने की विद्या में वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, तथा गणित सम्बन्धी नवीन-नवीन आविष्कार करने की शक्ति उत्पन्न होती है।
“विद्यार्थं ब्रह्मचारी स्यात्।”
( महात्मा विदुर )
विद्याध्ययन करने के ही लिये ब्रह्मचारी बनना चाहिये। इसी सिद्धान्त को लेकर बहुत से विद्यार्थी आजन्म ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
अब हम पाठकों को ब्रह्मचर्य से विद्या के अध्ययन में क्यों सफलता मिलती है ? इस सम्बन्ध की एक रोचक आख्यायिका सुनाते हैं:—
एक दिन देवर्षि नारद अमरावती में इन्द्र के पास उनसे मिलने गये। वहाँ वे उन से मिल कर बड़े प्रसन्न हुये। इन्द्र को किसी स्थान की, वेद की कई ऋचायें मूल गई थीं। अतः उन्होंने चतुरता से पूछा कि असुक स्थान की ऋचा कैसे है ? इस पर नारद जो ने सखर उन मन्त्रों का पाठ कर सुनाया। तब इन्द्र को आश्चर्य हुआ और उन्होंने कहा कि अब रहने दीजिये, काम हो गया। मैं तो आपकी परीक्षा ले रहा था। यह बात सुन कर, नारद जो अत्यन्त रुष्ट हुए और उन्होंने कहा कि तुम्हें एक ब्रह्मचारी की परीक्षा करने में लज्जा नहीं आई ! भला ब्रह्मचारी की विद्या कभी तुम्हारी तरह नष्ट हो सकती है। सुक से कहीं की भी ऋचा पूछ सकते हो ! यदि फिर कभी ऐसा दुस्साहस कर, किसी ब्रह्मचारी की परीक्षा करोगे, तो अवश्य ही