ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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४—ब्रह्मचर्य से विद्याध्ययन
“विद्यायां विन्दतेऽमृतम् ।
( शुद्धकोमानिषत् )
विद्या के प्रभाव से परमानन्द मिलता है ।
ब्रह्मचर्येण विद्या, विद्यायां ब्रह्मलोकम् ।
( अथर्व-संहिता )
वीर्य-रक्षा के द्वारा ही विद्या प्राप्त होती है और विद्या के मिलने से ही मनुष्य ब्रह्मलोक का सुख पाता है ।
ऊपर के मंत्र में यह बात कही गई है कि ब्रह्मचर्य ही विद्या का मूल है । बिना ब्रह्मचर्य के विद्या की उपलब्धि नहीं हो सकती, जो वास्तव में सत्य है ।
ब्रह्मचर्य और विद्या में वृद्ध और शाखा के समान सम्बन्ध है । यही कारण है कि ब्रह्मचर्य के द्वारा ही विद्या के अध्ययन करने का नियम प्रचलित किया गया था । ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य की अवस्था में ही वेद-वेदाङ्गों का अभ्यास कर लेते थे । और जब तक विद्या प्राप्त नहीं हो जाती थी, गृहस्थाश्रम में पैर नहीं घरते थे ।
जो विद्या ब्रह्मचर्य के द्वारा गृहीत होती है, वह कभी खंखलित नहीं होती ! वीर्य के प्रभाव से ज्ञान के गूढ़ तत्वों का शीघ्र ही हृदयङ्गम हो जाता है । विद्यार्थी की धारणा-शक्ति सदा जागृत और तीव्र रहती है, जिससे कि वह थोड़े ही अभ्यास से विशेष लाभान्वित होता है । ओ लोग ब्रह्मचर्ययुक्त विद्याध्ययन करते