ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन
पड़ती थी। युद्ध में अनेक योद्धाओं और वीरों को नीचा दिखलाने पर ही उनका स्वयंवर विवाह होता था।
जो पुरुष बल का अर्जन करना चाहें, उसके लिये ब्रह्मचर्य हो एक मात्र सच्चीवनी-चट्टी है। धिना वीर्य के शक्ति स्थिर नहीं हो सकती।
अब हम अपने पाठकों को ब्रह्मचर्य से शक्ति-साधन करने वाले महाभारत के एक महावीर की कथा सुनाते हैं:—
महाभारत के भीष्म पिता को आज भी हिन्दू-जाति नहीं भूली है। उनसे वद कर वीर-पराक्रमी कदाचित ही कोई रहा हो। उन्होंने अपने पिता के लिये ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा की थी। इस व्रत के पालन से उनका शरीर वज्र के समान हो गया था। वीर्य-रक्षा के कारण ही वे युद्ध में कभी भी पराजित नहीं हुये। उनका सारा जीवन बल की ही उपासना में व्यतीत हुआ। युद्ध होने पर भी महाभारत के महायुद्ध में ९ दिन तक पाण्डव-सेना के वहे-वहे महारथी, शूर-वीर तथा नाना शास्त्र चलाने वाले निपुण लोगों के दाँत खट्टे करते रहे। विपत्तियों के दल में त्राहि! त्राहि! का शब्द होने लगा। वीरवर अर्जुन और नीतिज्ञ श्रीकृष्ण की भी बुद्धि चकर खाने लगी। पितामह को यह शक्ति कष्टों से प्राप्त हुई थी? इसका एक मात्र उत्तर यह है कि उनके अखण्ड ब्रह्मचर्य द्वारा! जो कि उन्हें अत्यन्त प्रिय था, और जिस के लिये उन्होंने सांसारिक समस्त सुखों को तिलाञ्जलि दे दी थी।