भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 113, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 113

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

११८

ब्रह्मचर्य से सम्पत्ति-सेवा

“नाऽनाश्रान्ताय श्रीरक्ति ।”

(ऐतरेय-ब्राह्मण)

बिना पुरुषार्थ के धन नहीं मिलता ! लक्ष्मी पुरुषार्थ के वश में सदा रहती है ।

“धर्मार्थे काम मोक्षार्थामारोग्य मूल मुक्तामम् ।”

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का उत्तम साधन आरोग्य ही है । एक आरोग्य के अधीन सब कुछ है ।

ब्रह्मचर्य से ही प्रसन्न धन प्राप्त किया जा सकता है । न्यभिचारी पुरुष का धन नष्ट हो जाता है । ब्रह्मचारी अपने नियम का बड़ा टूट होता है । वह अपने संयम-बल से सम्पत्ति एकत्र करता है । उसमें सतत परिश्रम का अभ्यास होता है । जो लोग ब्रह्मचर्य का नाश कर देते हैं, वे सम्पत्ति की रक्षा नहीं कर सकते । बड़े-बड़े धनी जब तक ब्रह्मचर्य-रत रहे हैं, तब तक उनकी उन्नति होती गई है । लक्ष्मी सदा ब्रह्मचारी तथा वयोगी की ओर रहती है । यदि धनवान् बनना हो और अपने सन्निध धन को सुरक्षित करना हो, तो वीर्य-रक्षा पर पूर्ण ध्यान दो !

ब्रह्मचर्य अनेक प्रकार की सेवाओं का भी मूल कारण है । देश, जाति, समाज, राज्य और आत्म-सेवायें बिना ब्रह्मचर्य के निभ नहीं सकतीं । सेवाओं का आधार आरोग्य है । शरीर के स्वस्थ रहने पर ही मनुष्य सेवा में सब प्रकार से लग सकता है । वह स्वास्थ्‍य वीर्य-संरक्षण के अधिकार में है । ब्रह्मचारी पुरुष औरों की अपेक्षा बहुत कार्य कर सकता है । आज तक जितने

ब्रह्मचर्य विज्ञान · पृष्ठ 113, कुल 380 में से · BharatKosha