भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य से अपूर्व मेधा

प्रकार के सेवक हुए हैं, सबको इस अमूल्य सिद्धान्त की प्रतिष्ठा करनी पड़ी है। धर्म-सेवक, देश-सेवक, जाति-सेवक तथा राज्य-सेवक—सब ब्रह्मचर्य की शरण में रह कर ही अपने मनोरथ सफल-भूत कर सके हैं। इसलिये जो सेवा-कार्य करना चाहें, वह इस ब्रह्मचर्य-बल को अवश्य प्राप्त करें।

७—ब्रह्मचर्य से अपूर्व मेधा

“मेधा देवैस्सर्वै रुपास्या।”

(श्रुति)

मेधा वह शक्ति है, जिसकी सभी विद्वान् लोग उपासना करते हैं।

“मेधा दिव्या वरा शक्ति, ब्रह्मचर्येण युज्यते।”

मेधा वह पवित्र और श्रेष्ठ शक्ति है, जो वीर्य-रक्षण के द्वारा ग्रहण की जाती है।

मेधा वास्तव में ईश्वरीय-शक्ति है। इसके बिना सब न्यर्थ है। प्राचीन समय में हमारे पूर्वज आर्य लोग, इसकी बड़े परिश्रम से उपासना करते थे। इसके लिये देवताओं से वर प्राप्त करते थे। इसके लिये अपना सर्वस्व अर्पण कर देते थे।

इस मनुष्य-शरीर में सतिष्क सब से श्रेष्ठ स्थान माना गया है। वह मेधा-शक्ति इसी विहार-क्षेत्र में विचरण करती है। ब्रह्मचारी पुरुषों की मेधा अत्यन्त तीव्र होती है। उनके सतिष्क में सदैव उन्नत विचार-प्रवाह प्रवाहित होता रहता है।