भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान . . .

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वीर्य-रक्षा से मस्तिष्क बहुत प्रबल हो जाता है। निर्बल मस्तिष्क की अपेक्षा बलवान मस्तिष्क अधिक कार्य कर सकता है। यह बात बहुत ही सत्य है कि उत्तम मस्तिष्क में ही उत्तम मेधा रह सकती है। जो पुरुष अपने वीर्य को सुरक्षित रखता है, उसी का मस्तिष्क बलिष्ठ और मेधा तीव्र हो सकती है।

यह बात हम बहुत से ग्रन्थों में देखते हैं कि हमारे ऋषि-मुनि बड़े मेधावी और विद्वान् होते थे। बड़े से बड़े ग्रन्थ को एक बार सुन कर ही खरगण रखते थे। उनके पास नाना विचारों और कलायें थीं। गुरु लोग अपने विचारियों को गूढ़ से गूढ़ ज्ञान की शिक्षायें देते थे और वे बिना परिश्रम के उनके वाक्य तक कष्टस्य कर रखते थे। बहुत से लोग बहुश्रुत होते थे। उनका यही काम था कि वेदों तथा शास्त्रों को सुनकर ही पण्डित हो जाते थे। उन्हें पढ़ने की आवश्यकता ही नहीं होती थी। इसीलिए वे बहुश्रुत कहें जाते थे और लोग उनकी बड़ी प्रशिक्षा करते थे।

ऊपर की बातों को जान कर यह प्रश्न मन में उठता है कि उनको क्या ऐसी विलक्षण शक्ति प्राप्त थी, जिससे कि वे ऐसा कर सकते थे? आजकल की तो यह दशा है कि सौ बार का रटा हुआ एक स्त्रीक भी भूल जाता है। उन्हें दिव्य मेधा-शक्ति प्राप्त थी ! यह मेधा-शक्ति उन्हें मिलती कहाँ से थी? उनके ब्रह्मचर्य के गताप से। वे लोग ब्रह्मचर्य का इसीलिए पालन करते थे कि उनकी मेधा इतनी तीव्र थी, जिससे कि जिस विद्या का वे अध्ययन करें, वह स्थायी रूप से बनी रहे। इस विषय में एक आख्यायिका नीचे दी जाती है:—

केशरी-कुमार हनुमान का नाम जगत्प्रसिद्ध है। वे बाल-