भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य से दीर्घायु

ब्रह्मचारी थे। एक दिन वे सूर्य नारायण के पास वेद पढ़ने के लिये गये। उन्होंने उनसे वेद पढ़ने की प्रार्थना की। इस पर उन्होंने हनुमान से कहा कि हमें पढ़ाने में कोई आपत्ति नहीं, पर मैं जो कुछ कहूँगा, एक ही बार, कदाचित् तुम उसे ब्रह्मण न कर सकोगे ! फिर तुम्हें हमारे रथ के साथ खलटा चलना होगा। यह बात हनुमान ने मान ली और सूर्य भगवान के तीव्र घोड़ों के रथ के आगे चलते पाँच विद्या पढ़ते हुए अस्ताचल तक गये। फिर सूर्य ने उनसे सुनाने को कहा। उन्होंने सत्वर जो कुछ पढ़ा था, कह सुनाया। सूर्य ने उनको अपूर्व सेवा की बड़ी प्रशंसा की और उनको आशीर्वाद देकर विदा किया।

८—ब्रह्मचर्य से दीर्घायु

“दीर्घायु ब्रह्मचर्यया !”

( रुक्मि )

ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन करने से मनुष्य को दीर्घायु प्राप्त होती है।

यो विभर्ति दावायाणं हिरण्यं, स देवेषु कृणुते दीर्घं मायुः, स मातृषेषु कृणुते दीर्घमायुः ।

( गवर्धन )

जो अपने शरीर में अनुपम वीर्य को रक्षित रखता है, वह विद्वानों में दीर्घायु प्राप्त करता है—वह साधारण लोगों में भी दीर्घजीवी होता है।