ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 117, कुल 380 में से
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अपने में वीर्य भरने वाला पुरुष, ज्ञानी हो या अल्पज्ञ, उसी दोनों अवस्थाओं में दीर्घजीवन प्राप्त होता है ।
न तद्रक्षसि पिशाचाश्चरन्ति, देवानां भोजः प्रथमजं होतत् ।
( यजुर्वेद )
जो पुरुष वीर्य की रक्षा करता है । उसे राक्षस और पिशाच नहीं सताते । यह वीर्य विद्वान् लोगों का आत्मतेज या दिव्य गुणों का सारंश है । यह उन में प्रथमतः उत्पन्न होता है ।
‘राक्षस’ नाम है पापी का और ‘पिशाच’ दुष्ट को कहते हैं । एक ब्रह्मचारी पुरुष को पापी और दुष्ट का कुछ भी भय नहीं रहता । वे इसके प्रभाव से स्वयं भयभीत रहते हैं और किसी प्रकार का कष्ट नहीं दे सकते । वीर्य की रक्षा करने वाले से, पापी और दुष्ट का, उसे नष्ट करने में, कुछ भी वश नहीं चलता ।
यह बात सभी लोग जानते हैं कि ‘राक्षस’ और ‘पिशाच’ के लगने से मनुष्य का आयुर्बल क्षीण हो जाता है । इसीलिए लोग उनसे बचने का उद्योग करते हैं । पापी और दुष्ट पुरुष भी मनुष्य के आचरण को भ्रष्ट कर देते हैं । इनके संपर्क से आयुर्बल का हास होला है । जो लोग सच्चे बीर्य-रक्षक हैं, वे इनसे बचे रहते हैं ।
व्यभिचार से मनुष्य का आयुर्बल क्षीण हो जाता है । मार्चीन अथवा अर्वाचीन समय में एक भी व्यभिचारी पुरुष दीर्घजीवी होता नहीं देखा गया । इतिहास में दीर्घजीवी पुरुषों के जीवन-चरित के पढ़ने से यह बात पूर्ण रूप से सिद्ध हो चुकी है कि ब्रह्मचर्य के पालन से ही उनको दीर्घजीवन प्राप्त हुआ था ।