भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य से दीर्घायु

दीर्घजीवन का मूल कारण वीर्य-रक्षण है। जिसका जितना ही पुष्ट वीर्य है, वह उतना ही अधिक दिनों तक जीवित रह सकता है।

ब्रह्मचर्य में वीर्य-रक्षा प्रधान है। वीर्य के रक्षित होने पर ओज की वृद्धि होती है। ओज की बढ़ती के ही भीतर जीवनी-शक्ति है। इसी अद्भुत शक्ति से मनुष्य का शरीर सुदृढ़ और स्वस्थ रहता है। शरीर की सुदृढ़ता और स्वस्थता के ही ऊपर दीर्घायु-अवलम्बित है।

कहने का अभिप्राय यह है कि ब्रह्मचर्य के पालन से ही दीर्घजीवन प्राप्त हो सकता है। जो जितना दीर्घजीवी होना चाहता है, वह उतना ही वीर्य की रक्षा करे। वीर्य का व्यय ही जीवनी-शक्ति का प्रधान नाशक है।

कुछ लोगों का कहना है कि सतयुग, त्रेता और द्वापर में मनुष्य का आयुर्वल विशेष होता था, सो अब कलियुग के कारण कम हो गया है। इस बात को हम मानते हैं, पर इसके साथ यह भी था कि अन्य युगों में ब्रह्मचर्य का पालन भी विशेष रूप से किया जाता था, जो दिन पर दिन बढ़ता ही गया और कलियुग में नाम ही नाम रह गया। यदि इस समय भी ब्रह्मचर्य का विधिवत पालन हो, तो अब भी दीर्घजीवी पुरुष हो सकते हैं। यह कोई विचित्र बात नहीं! अब हम कुछ दीर्घजीवी पुरुषों के नाम और उनकी अवस्था की तालिका नीचे लिखते हैं। इस तालिका से पाठक स्वयं जान जायेंगे कि ये पुरुष किस प्रकार के सत्युष, धर्मनिष्ठ और सदाचारी थे:—

भीष्म-पितामह १७०, महर्षिऋष्य १५७, वसुदेव १५५,