भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विधान

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भगवान् बुद्ध १४०, भुतराष्ट्र १३५, श्रीकृष्ण १२६, रामानन्द गिरि १२५, महात्मा कबीर १२०, युगराज लोहकार ११५, महाकवि भूपण १०२, स्वामी सच्चिदानन्द, १०० महाकवि मतिराम ९९, गोस्वामी तुलसीदास ९१, यतीन्द्रनाथ ठाकुर ८५ और भक्त वर सुरदास ८० वर्षों तक जीवित रहे ।

८० से लेकर १०० वर्ष तक की अवस्था के इस समय भी कई पुण्यतमा विद्यमान हैं । लेखक ने स्वयं कई ऐसे स्त्री वषों के पुरुषों को देखा है, जिनकी नेत्र-व्योति, शारीरिक स्थिति और स्वरण-शक्ति उत्तम, दृढ़ तथा तीव्र थी । उनसे तथा उनके जानने वालों से पढ़ने पर यह बात जानी गई कि वे बाल-ब्रह्मचारी या नियमपूर्वक वीर्य-रक्षक थे ।

श्रीमद्भागवत के अनुसार कलि-काल में भी मनुष्य के आयुष्य का परिसाण १२० वर्षों का है । इससे पूर्व मरने वाले अकाल मृत्यु से मरते हैं । ब्रह्मचर्य-व्रत से हीन होने वाले ही लोग इस अकाल मृत्यु के प्राप्त होते हैं । वीर्य का विधिवत् रक्षा करने वाला पुरुष ही अपने आयुष्य का पूर्ण उपयोग कर सकता है ।

अथर्ववेद में १०१ प्रकार की मृत्युयें ( शरीर से आत्मा के प्रयत्न होने की आवश्यकतायें ) मानी गई हैं । उनमें से १०० को अकाल मृत्यु हैं । पूर्ण मृत्यु उनमें से १ ही है । इस अनियम मृत्यु से मरने वाला पुरुष ही भाग्यवान है और उसी की सदगति होती है । जो लोग अकाल मृत्यु से मरते हैं, वे मोक्ष के अधिकारी नहीं होते । इसलिये जो लोग अकाल मृत्यु से बचना चाहते हैं, उन्हें ब्रह्मचर्य का अवश्य पालन करना चाहिये !