ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
ब्रह्मचर्य-विधान
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भगवान् बुद्ध १४०, भुतराष्ट्र १३५, श्रीकृष्ण १२६, रामानन्द गिरि १२५, महात्मा कबीर १२०, युगराज लोहकार ११५, महाकवि भूपण १०२, स्वामी सच्चिदानन्द, १०० महाकवि मतिराम ९९, गोस्वामी तुलसीदास ९१, यतीन्द्रनाथ ठाकुर ८५ और भक्त वर सुरदास ८० वर्षों तक जीवित रहे ।
८० से लेकर १०० वर्ष तक की अवस्था के इस समय भी कई पुण्यतमा विद्यमान हैं । लेखक ने स्वयं कई ऐसे स्त्री वषों के पुरुषों को देखा है, जिनकी नेत्र-व्योति, शारीरिक स्थिति और स्वरण-शक्ति उत्तम, दृढ़ तथा तीव्र थी । उनसे तथा उनके जानने वालों से पढ़ने पर यह बात जानी गई कि वे बाल-ब्रह्मचारी या नियमपूर्वक वीर्य-रक्षक थे ।
श्रीमद्भागवत के अनुसार कलि-काल में भी मनुष्य के आयुष्य का परिसाण १२० वर्षों का है । इससे पूर्व मरने वाले अकाल मृत्यु से मरते हैं । ब्रह्मचर्य-व्रत से हीन होने वाले ही लोग इस अकाल मृत्यु के प्राप्त होते हैं । वीर्य का विधिवत् रक्षा करने वाला पुरुष ही अपने आयुष्य का पूर्ण उपयोग कर सकता है ।
अथर्ववेद में १०१ प्रकार की मृत्युयें ( शरीर से आत्मा के प्रयत्न होने की आवश्यकतायें ) मानी गई हैं । उनमें से १०० को अकाल मृत्यु हैं । पूर्ण मृत्यु उनमें से १ ही है । इस अनियम मृत्यु से मरने वाला पुरुष ही भाग्यवान है और उसी की सदगति होती है । जो लोग अकाल मृत्यु से मरते हैं, वे मोक्ष के अधिकारी नहीं होते । इसलिये जो लोग अकाल मृत्यु से बचना चाहते हैं, उन्हें ब्रह्मचर्य का अवश्य पालन करना चाहिये !
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ब्रह्मचर्य से उत्साह-साहस
६—ब्रह्मचर्य से उत्साह-साहस
उत्साह और साहस के बिना संसार का एक काम भी सुचारु-रूप से सम्पादित नहीं हो सकता। इन दोनों का निवासस्थान हृदय है। जिसका हृदय जितना ही बलिष्ठ है, वह पुरुष उतना ही उत्साही और साहसी हो सकता है। हृदय का बलवान होना ब्रह्मचर्य के अधीन है। जिसने वीर्य की रक्षा की है, उसमें उत्साह और साहस की छाया हम देख सकते हैं। वीर्य के बिना हृदय कभी पुष्ट नहीं हो सकता। यह बात प्रायः देखने में आती है कि व्यभिचारी पुरुष अतुत्साही और असाहसी होते हैं। अब पाठक समझ गये होंगे कि उत्साह और साहस का एक मात्र मूल वीर्य है—ब्रह्मचर्य का पालन है।
पवन-पुत्र हनुमान जानकी को खोजने के लिये समुद्र पार कर लङ्का में पहुँचे। वहाँ उन्होंने बहुत दृढ़ता, पर जानकीजी का कुछ भी पता न चला। तब वे बहुत घबड़ाये और बैठ कर विचारने लगे कि यदि जानकी नहीं मिली, तो मैं जी नहीं सकता। मेरे मरने पर सुमित्रा भी मेरे शोक में मर जायँगे। इस प्रकार राम-लक्ष्मणादि सभी एक के शोक में दूसरे मर जायँगे। इन सब बातों के पश्चात् उनको अपने ब्रह्मचर्य का ध्यान हुआ और इस कारण से उनके हृदय में उत्साह का पुनः सञ्चार हो उठा। उन्होंने विचार कि कठिन से कठिन कार्य उत्साह से सम्पादित हो सकता है। वाल्मीकि-रामायण में उन्होंने उत्साह की बड़ी प्रशंसा की है। अन्य में इसी उत्साह के कारण उन्होंने जानकी को खोज कर ही शांति ली।
भीष्म पितासह काशिदास की अस्त्रा, अम्बिका और अम्बा-
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लिका नाम की तीन कन्यायें जीत कर ले लगे। अम्बिका और अम्बालिका का विवाह तो अपने दोनों छोटे भाई चित्राङ्गद और विधिचित्रकी के साथ कर दिया, पर ब्रह्मचारी रहने के कारण अम्बा को लौटने की आज्ञा दी। इस पर अम्बा को दुःख हुआ। उसने महायोगदा परशुराम के पास जाकर अपना कष्ट निवेदन किया। उन्होंने कहा कि हम तुम्हारे लिये भीष्म से युद्ध करेंगे। यदि वे हम से परास्त हो गये, तो तुम्हारा विवाह उनसे करा दिया जायगा। वे अम्बा को लेकर भीष्म के यहाँ आये और समन्था का कि तुम इसके साथ विवाह करलो। पर उन्होंने अस्वीकार किया। भीष्म ने यह बात कही कि यदि आप से युद्ध में हार गया तो विवाह कर लेंगा। दोनों में घोर युद्ध ठन गया। भीष्म के हृदय में ब्रह्मचर्य के कारण अटूट साहस था। उन्होंने अस्वीका स्मरण किया और उन्हें विश्वास हो गया कि मेरा पक्ष न्याय का है और मैं पराजित नहीं हो सकूँगा। अन्त में परशुराम जी हार कर चले गये।
अब इन दो कथाओं से उत्साह और साहस का परिचय पा गये होंगे। ब्रह्मचर्य के पालन करने वालों को ही ये दो दिव्य शक्तियाँ प्राप्त होती हैं। यदि उत्साह-साहस से अपने को मूर्खित करना है—तो अपने वीर्य की भली भाँति रक्षा करनी चाहिये।
१०—ब्रह्मचर्य से स्वास्थ-रक्षा
“शरीरमार्चं खंजु धर्म-साधनम्”
(वैशक)
हमारा शरीर ही सब धर्मों का प्रधान साधन है।
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ब्रह्मचर्य से स्वास्थ्थ-रत्ना
“धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ।”
( सूक्ति )
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का मूल कारण आरोग्य ( स्वास्थ्थ ) ही है ।
अब हम वैद्यक मतानुसार स्वास्थ्थ के लक्षण लिखते हैं । इन लक्षणों के विपरीत होने से अस्वस्थ या रोगी सभक्तता चाहिये:-
समदोषः समाश्रित्य, समधातु मलक्रियः ।
प्रसन्नात्येन्द्रिय मनाः, स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥
( महर्षि ब्रह्मृत. )
जिस मनुष्य के तीनों दोष, ( वात, कफ और पित्त ) अंग्रि ( अन्य पचाने और भूल लगाने वाली शक्ति ) धातु ( रस, रक्त, मांस, मेदा, अस्थि, मज्जा, और वीर्य ) मल और मूत्र आदि उचित अवस्था में हों—जिसके आत्मा, इंद्रिय और मन प्रसन्न तथा अपने अपने कार्यों में लगे हों, वह पुरुष स्वस्थ कहलाता है ।
स्वास्थ्थ की परिभाषा हो चुकी । अब यह देखना है कि भारत-वासियों में कितने लोग स्वस्थ हैं । हमारे विचार से एक भी नहीं, ऊपर के दिखे गये लक्षण कदाचित् ही किसी भाग्यशाली पुरुष में घटते हों । किसी को वात-विकार, किसी में कफ का कोप, किसी में पित्त की विद्रुति, किसी की अग्नि विगड़ी हुई, किसी के रसादि धातुओं में चीणावा, किसी का मल दूषित और किसी के मूत्र अनियमित हो गया है । हमारे विचार से इन सब ठुरे लक्षणों का एक मात्र कारण ब्रह्मचर्य का अभाव है । एक वीर्य-क्षय से अनेक दुर्गुण उत्पन्न हो जाते हैं । हमारे स्वास्थ्थ का सर्वोत्तम साधन ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मचारी पुरुष ही उत्तम स्वास्थ्थ का लाभ कर
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सकता है। जो न्यभिचारी पुरुष हैं, उन्हें भान भी नहीं होता और उनके शरीर में धीरे-धीरे अस्वास्थ्यकर लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, और फिर वे ही बंदते-बढ़ते नाश का कारण बनते हैं।
दिनचर्यां निशाचर्यां, ऋतुचर्यां यथोदिताम्।
आचरन् पुरुषः स्वस्थः सदा तिष्ठति नान्यथा ॥
दिनचर्या, (आतःकाल से सार्यकाल तक के नियमित कर्म) रात्रिचर्या: (सार्यकाल से लेकर प्रभात तक के कृत्य) और ऋतुचर्या (छः ऋतुओं में आहार-विहार के नियम) का चर्चित रीति से पालन करने से ही मनुष्य सदा स्वस्थ रह सकता है। अन्यथा नहीं!
इन चर्याओं का यथाविधि पालन करना भी ब्रह्मचर्य है। जो ऊपर की तीनों चर्याओं का पालन कर अपने स्वास्थ्य को बिगड़ने नहीं देता, वह पुरुष वास्तव में ब्रह्मचारी है। इन चर्याओं को नियमित रूप से ही करने के लिये ब्रह्मचर्य की आवश्यकता होती है। हमारे प्राचीन ब्रह्मचर्याश्रम में इन्हीं को संयमित और निश्चित करने के लिये ब्रह्मचारियों को बहुत समय तक नहीं रहना पड़ता था। फिर वहाँ से गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट होकर, इन्हीं चर्याओं का पूर्ण अभ्यास किया जाता था।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य और स्वास्थ्य का, कितना घनिष्ठ सम्बन्ध है। जहाँ ब्रह्मचर्य नहीं, वहाँ स्वास्थ्य नहीं। जहाँ ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा की जाती है, वहाँ स्वास्थ्य के लिये रोना नहीं पड़ता।
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ब्रह्मचर्य से सुसन्तान
११—ब्रह्मचर्य से सुसन्तान
क्रोडर्यः पुत्रेण जातेन, यो न विद्वान् धार्मिकः ।
( गीति )
उस पुत्र के उत्पन्न होने से क्या लाभ, जो कि न तो विद्वान् है और न धार्मिक हा ?
सबके मन में यही अभिलाषा रहती है कि सन्तान हो, जिससे कि हमारी वंश-शुद्धि हो । वह अच्छी भी हो, जिससे कि हमारा संसार में यश फैले । यह बात सुनी नहीं है । पर बहुत थोड़े लोग हैं, जो नियम-पूर्वक सन्तान उत्पन्न कर सकते हैं । कितने लोग ऐसे हैं जो मर जाते हैं, पर उन्हें पुत्र-पुत्रियों के मुख-दर्शन का सौभाग्य नहीं प्राप्त होता । कुछ के बच्चे ही बच्चे होते रहते हैं, पर वे जीते नहीं । कुछ के कुछ दिन और वर्षों के लिये होते हैं । कुछ के कुछ दिन जीते भी हैं, तो महा मूर्ख और अनेक दोषों से ग्रसित ।
अब हम अपने मन से पूछते हैं कि इन सब दोषों का क्या कारण है ? तो हमें यही उत्तर मिलता है कि ब्रह्मचर्य का पालन न होना । जब से हमारे देश में ब्रह्मचर्य-प्रणाली उठ गई, तब से हममें इन दोषों का सन्धार हुआ है । इससे पहले कभी ऐसी अवस्था नहीं थी । हमारे श्राद्धि-युक्ति मनोवाञ्छित सन्तान उत्पन्न करते थे । वे सन्तान की कृद्वा से ही मैथुन में प्रवृत्त होते थे । वीर्य-रक्षण के प्रताप से वह शक्ति उत्तकी प्राप्त थी कि वे कभी भी निष्फल नहीं होते थे । उत्तकी सन्तान भी उत्तम आचार-विचार
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वाली होती थी। इतना ही नहीं, वह स्वस्थ और दीर्घायु भी प्राप्त करती थी। पिता-माता के ही संयोग से सन्तान की उत्पत्ति होती है। इसलिये उनके गुणानुगुणों का उस पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है। इस सम्बन्ध में एक आख्यायिका है:—
पितामह ब्रह्मा ने चार पुत्र उत्पन्न किये। उनसे उन्होंने प्रजा की सृष्टि करने को कहा। पर वे अस्तीकार कर गये। इसका कारण यह था कि ब्रह्मा ने सात्विक दृष्टि से उनको उत्पन्न किया था। इसलिये वे ब्रह्मचारी और सतीगुणी हो गये। फिर ब्रह्मा ने और सात पुत्र उत्पन्न किये। वे राजस दृष्टि से उत्पन्न किये जाने के कारण, रजोगुणी और प्रवृत्ति-पारायण हुए। उन्होंने प्रजा की सृष्टि की।
अब पाठक ऊपर की आख्यायिका के पढ़ने से समझ गये होंगे कि जैसी जिसकी मानसिक दृष्टि रहती है; वैसी ही उसकी सन्तान होती है। यदि हम ब्रह्मचारी हैं, तो हमारी सन्तान भी ब्रह्मचर्य-रत होगी। ज्यमिचारी पुरुष की सन्तान कभी अच्छी नहीं हो सकती। जब तक देश में ब्रह्मचर्य का विधिवत् पालन नहीं किया जाता, तब तक सुसन्तान के लिये शताब्दियों तक मीखना पड़ेगा। ब्रह्मचर्य-पूर्वक गर्भाधान करने वाले कर्चित दी चार पुरुष हों। जो मैथुन सुसन्तान के लिये पुरुष-कार्य समझ जाता था, वह अब अह्वानी पुरुषों की कृपा से ज्यमिचार का अन्न बन गया। यह बड़े परिहास की बात है!
यदि मनोऽनुकूल बालक उत्पन्न करना है—यदि सन्तान को उत्तम और संदुर्गुणी बनाना है—यदि उन्हें दीर्घजीवन-प्रदान
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ब्रह्मचर्य से 'रोग-शान्ति'
करना चाहते हो, तो यह असयन्ते आवश्यक है कि ब्रह्मचर्य का समुचित पालन किया जाय ।
१२—ब्रह्मचर्य से रोग-शान्ति
जात मार्ग नयः शत्रुः, व्याधिश्च मयामक्षयेत् । अति पुष्टाङ्गं गुक्ताऽपि, सपश्चात्तेन हन्यते ॥
(सूक्ति)
शत्रु और व्याधि को उत्पन्न होने ही नष्ट कर देना योग्य है । क्योंकि इनके बढ़ जाने पर, अत्यन्त हृष्ट-पुष्ट पुरुष भी इन के द्वारा मारा जाता है ।
इस देश में स्वस्थ पुरुषों और स्त्रियों की संख्या अंगुलियों पर गिनने योग्य हो गई है । अनेक लोग अपने आरोग्य के लिये विविध यज्ञ करते रहते हैं, फिर भी वे अस्वस्थ ही रहा करते हैं । जनता में निस्तेज और निर्बल शरीर वाले मनुष्यों को देख कर एक बार हृदय थाम कर रह जाना पड़ता है । इस रोग-भस्मता का कारण यही है कि लोग ब्रह्मचर्य-भ्रष्ट होकर अपना जीवन बिता रहे हैं, इसी से वे प्रायः रोगी देखे जाते हैं । न्यभिचार और इन्द्रिय-लोलुपता बहुत बढ़ी हो रही है । ब्रह्मचर्य किस पत्नी का नाम है । इसका ध्यान ही नहीं है । हम बल-पूर्वक यह बात कहते हैं कि एक पुरुष, जो ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला है, उसे रोग नहीं उत्पन्न हो सकता । जिसने, अपने वीर्य का महत्व न समझ कर, उसको अनियमित प्रकार से अपने शरीर से अलग किया
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है, वह रोग से वैंच भी नहीं सकता ! प्रायः दुराचारी पुरुषों को ही भयङ्कर रोगों का आखेट होना पड़ता है ।
प्राचीन समय में लोगों को प्रायः रोग होते ही नहीं थे । जिसे रोग होता था, वह पापी और नीच समझा जाता था । वह अपने को धर्माचरण और सदाचार से युक्त करता था ।
आज कल लोग वैद्यक-शास्त्र के हितोपदेशों की अवहेलना करने लग गये हैं । ब्रह्मचर्य-युक्त आहार-विहार को छोड़ कर प्रकृति के विरुद्ध चलते हैं । इसका परिणाम यह होता है कि वे कभी सुखी नहीं रहते । उनके साथ-साथ एक न एक रोग बराबर चलाता रहता है । माना प्रकार की औषधियाँ खाते रहते हैं, पर अपने दुष्कर्म को छोड़ने में असमर्थ रहते हैं । ऐसे लोग कभी आरोग्य-लाभ नहीं कर सकते । हमारे विचार से ब्रह्मचर्य सब औषधियों का पितामह है । जो पुरुष इसका विधिवत् सेवन करता है, वह कभी रोगी नहीं रह सकता । अमृत-सुख्य औषधोपचार करते रहने पर भी, ब्रह्मचर्य का पालन न करने वाला पुरुष, रोग-रहित नहीं हो सकता । किसी रोग को मूल से नाश करना हो, तो उससे छुटकारा पाने तक, अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये ।
एक बड़े अनुभव की वैद्य थे । उनका कहना था कि १ वर्ष नियमित ब्रह्मचर्य के पालन से भयङ्कर रोग नष्ट हो सकता है ! सचिकिल्ला का उन्होंने कई रोगियों पर प्रयोग किया और वे सफल निकले । तब से वे उसी की चिकित्सा करते थे, जो उनके आशा-नुसार वीर्य-रक्षा कर सकता था । वे नहीं से वीर्य-नाशक पुरुष को जान लेते थे, और फिर उसको औषधि नहीं देते थे ।
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ब्रह्मचर्य से ब्रह्मज्ञान
अब ऊपर की बात से पाठक जान गये होंगे कि ब्रह्मचर्य कैसी वस्तु है ? इसके पालन से कठिन से कठिन रोगों का संहार किया जा सकता है ।
१३—ब्रह्मचर्य से ब्रह्मज्ञान
“ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिं मत्तिरेष्वाधि गच्छति ।”
( योगेश्वर हृण्ण )
ब्रह्मज्ञान के प्राप्त हो जाने पर मनुष्य बहुत शीघ्र ही परमानन्द का अधिकारी होता है ।
“ऋते ज्ञानाच्च मुक्तिः ।”
( शंकराचार्य )
ब्रह्मज्ञान के बिना किसी की मुक्ति नहीं हो सकती ।
हमारे ऋषियों ने ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के लिये अनेक मार्ग निश्चित किये हैं । उन पर चल कर शीघ्र ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त किया जा सकता है । ब्रह्मज्ञान के प्राप्त हो जाने पर सब कुछ सुलभ हो जाता है । इस ज्ञान के लिये ही चार आश्रमों का विधान किया गया है ।
ज्ञानयोग्योपनिषद् में इन्द्र-विरोचन-संवाद है । उसमें ब्रह्मचर्य से ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति का समर्थन किया गया है । विलासह ब्रह्मा ने उन दोनों को ३२ वर्ष तक अखण्ड ब्रह्मचर्य पालन करने की शिखा दी है ।
“ब्रह्मचर्येण हो वेष्टात्मान मनुविन्दते ।”
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ब्रह्मचर्य के पालन करने से निश्चय पूर्वक यह इच्छित ज्ञान-ज्ञान प्राप्त होता है ।
प्रश्नोपनिषद् में ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में एक बड़ा ही रोचक तथा सार गर्भित कथानक आया है। हम उसे यहाँ उद्धृत करते हैं:- कवन्धी और कात्यायन नाम के दो ऋषिकुमार थे । वे दोनों ब्रह्मचारी थे । एक दिन वे दोनों ही ऋषिवर पिप्पलाद के आश्रम में गये, और उनसे ब्रह्मज्ञान की शिक्षा देने के लिये निवेदन किया।
तान् ह स ऋषिरुवाच—भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्मत्सरे संवत्स्यय, यथाकामान् प्रश्नान् पुरुषेभ्य, यदि विज्ञानास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्यामः ।
पिप्पलाद ने उन दोनों से कहा कि तुम दोनों एक वर्ष तक हमारे पास रह कर नियमानुसार श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करो । तत्पश्चात् जो प्रश्न चाहोगे, पूछ लेना । हम भी जो कुछ ज्ञान होगा, तुम लोगों को यथाशक्ति समझावेंगे ।
ऊपर के उदाहरण से यह बात जानी जाती है कि ब्रह्मज्ञान का अधिकारी ब्रह्मचारी ही पुरुष हो सकता है । पिप्पलाद जानते थे कि वे ऋषिकुमार ब्रह्मचारी हैं, पर ब्रह्मज्ञान के लिये उन्होंने उन दोनों से एक वर्ष तक विशेष रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करवाया । उन्होंने समझा कि ब्रह्मचर्य के बिना ब्रह्मज्ञान का अनुभव नहीं किया जा सकता ।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मज्ञान जैसे सद्बुद्धिष्व की योग्यता प्राप्त करने के लिये, ब्रह्मचारी रहना, कितना आवश्यक है ? जो पुरुष ब्रह्मज्ञान का लाभ करता चाहे, वह ब्रह्मचर्य का निश्चय रूप से पालन करे !
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ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व
१४—ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व
“अपुत्रस्य गतिनांरिते, स्वर्गं नैव च नैव च ।”
( सक्ति )
पुत्र-रहित पुरुष की मुक्ति नहीं होती । उसके लिये स्वर्ग का मिलना तो अत्यन्त असम्भव बात है ।
“स्वर्गे गच्छन्ति ते सर्वे, ये केचिद् ब्रह्मचारिणः ।”
( सक्ति )
संसार में जितने ब्रह्मचारी पुरुष हैं, वे सब स्वर्गमें जाते हैं ।
उपर के दोनों वचन शास्त्रीय हैं । पहले वचन का दूसरा अपवाद स्वरूप है । एक तो पुत्र के बिना मुक्तिही नहीं बतलाता, पर दूसरा कहता है कि बिना पुत्र के स्वर्ग तक मिल सकता है । जो लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे विविध स्वर्ग प्राप्त करते हैं ।
यह बात है भी बहुत सत्य ! प्राचीन समय में बालखिल्व, नचिकेता, हनुमान तथा भीष्म आदि अनेक ब्रह्मचारियों ने पुत्र उत्पन्न नहीं किया, पर वे मुक्त हो गये । ऐसा क्यों ? क्योंकि उन्होंने अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया था ।
केवल पुत्र उत्पन्न करने से ही कोई पुरुष मोक्ष या स्वर्ग का अधिकारी नहीं बन बैठता । पुत्र के योग्य होने पर ही ऐसा हो सकता है । यदि पुत्र अयोग्य हुआ, तो अपने पितरों को नरक-नामी बना के ही छोड़ता है । सुयोग्य पुत्र के उत्पन्न होने से ही भगुज्य तीन ऋष्यों—ऋषि-ऋष्य, देव-ऋष्य और पितृ-ऋष्य ) से मुक्त
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होता है। यही उसकी सच्ची मुक्ति है। सुयोग्य पुत्र विना ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन किये, किसी को किसी प्रकार, प्राप्त नहीं हो सकता। न्यभिचारी का शुक्र-सम्भूत पुत्र, सुयोग्य नहीं हो सकता।
अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले पुरुषों का पुत्र वत्स्य करने की शक्तियों में भाग्य नहीं है। वे मनसा, वाचा तथा कर्मणा संसार की सेवा करते हैं। उनकी शिक्षाओं तथा उद्योग से अनेक बालक सज्जन और सदाचारी बनकर, अपने छुट्पुत्र को यशस्वी बनाते हैं। उनके प्रताप से बहुत से विद्यार्थी अपना जीवन-सुधार कर पितरों को नरक में पड़ने से मुक्त करते हैं। फिर ऐसे पुरुष, जिनके कारण से, अन्य लोग स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं, वे क्यों न मुक्ति प्राप्त करें !
सुना जाता है कि पारस प्रस्तर के दर्शनों से लोह भी सुवर्ण हो जाता है। अखण्ड ब्रह्मचारी भी उसी पारस के समान है; जिसके संसर्ग से अनोध बालक भी सुवर्ण के समान गुणवान और मूल्यवान बन जाता है। लोहे को सोना बनने की आवश्यकता होती है, पारस को नहीं। जो मुक्त नहीं है, उसे ही मुक्ति की आवश्यकता होती है, ब्रह्मचारी को नहीं। वह तो स्वयं मुक्त है।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य मुक्ति और स्वर्ग का भी एक मात्र साधन है। जब तक ब्रह्मचर्य सिद्ध नहीं होता, तब तक मुक्ति भी नहीं प्राप्त हो सकती।
मुक्ति तो ब्रह्मचारी पुरुष की दासी बनी रहती है। वे इसकी चिन्ता ही नहीं करते। उनके लिये यह चुच्छ है !
मुक्ति से-बदकर ईशान्य माना गया है। मुक्तों को भी ईशान्य की लालसा लगी रहती है। अनेक योगीजन जिसके लिये आजी-
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[ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व]
वन तपस्या करते हैं, यदि उनकी साधना पूरी हुई, तो इस पद के अधिकारी होते हैं। इस ब्रह्म-पद का प्राप्त करना परम कठिन है। केनोपनिषद् में लिखा है:—
न तत्र चतुर्गच्छति नवामगच्छति न मनो न विश्वः । न तो वर्हो तत्क टष्टि पहुँचती है, न चाणी जा सकती है और न मन ही पहुँच सकता है। हम उसे जानते भी नहीं।
सर्वं !वेदा यत्पदमात्मनस्ति ।
तर्पासि सर्वाणि च यद्बदन्ति ॥
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ।
ततोपदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
( कठोपनिषद् )
सब वेद जिस पद का चिन्तन करते हैं। सब तप भी जिस-को बताते हैं और जिसके चाहने वाले ब्रह्मचर्य-प्राप्त का पालन करते हैं, उस पद को संक्षेप में कहते हैं।
ईश्वर-प्राप्ति के लिये वेद, तप और ब्रह्मचर्य, ये तीन साधन हैं। वेद और तप दोनों ब्रह्मचर्य के बिना सिद्ध नहीं हो सकते। इसलिये ब्रह्मचर्य को ही प्रधानता है। एक ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत वेद और तप दोनों की साधनार्थ विद्यमान हैं। बड़े-बड़े वेदाध्यायी और भारी-भारी तपस्वी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही अपने पद से च्युत हो जाते हैं। अतएव ईश्वर प्राप्त करने के लिये भी ब्रह्मचर्य सब से बड़ा साधन है। बिना ब्रह्मचर्य के ब्रह्मपद छुआय ही नहीं, अपितु नितान्त असम्भव है !
अब पाठक समझ गये होंगे कि ईश्वर-प्राप्ति के लिये भी ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। जिसके पालन से ईश्वर
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जैसे परम पद का लाभ हो सकता है, उसकी महिमा किससे गाई जा सकती है ?
१५—सृष्टि के आदि में ब्रह्मचर्य
पाठकों के मन में यह शङ्का उठनी स्वाभाविक है कि क्या सृष्टि के प्रारम्भ में भी ब्रह्मचर्य की मर्यादा स्थिर थी ? इसका समाधान हम श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के कथानक से करेंगे । वह इस प्रकार है:—
सनकश्च सनन्द्यश्च, सनातनमथात्मभूः । सनत्कुमारश्च मुनीन्निष्क्रियानुष्वरेतसः ॥
पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि-रचना के विचार से सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के मुनि-वृत्तिधारी ब्रह्मचारी चार पुत्रों को उत्पन्न किया ।
तान्बभाषे स्वभूः पुत्रान्प्रजाः सृजत पुत्रकाः । ते नैच्छन् भोज-धर्माणि, वासुदेव-परायणाः ॥
ब्रह्मा ने उन पुत्रों से कहा कि पुत्रो ! तुम लोग प्रजा की सृष्टि करो ! पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया । क्यों कि वे ब्रह्मचारी और परमात्मा के भक्त थे ।
उन पुत्रों ने प्रजा उत्पन्न करने से अस्वीकार क्यों किया ? इसका कारण यह था कि वे सालिक पुरुष थे; उन्होंने इस ब्रह्मचर्य की महत्ता दिखलाने के लिये ऐसा सत्कार्य किया ।
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ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल
प्रजापती पितरि ब्रह्मचर्यं मुमुक्षुंवा मनुष्या असुरा । उपित्त्य ब्रह्मचर्यं देवाःसुः प्रवीतु नो भवानिति तेष्यो हेत मन्त्र मुवाच द इति ॥
( शतपथ ब्राह्मण )
सृष्टि-रचना के अनन्तर पितामह ब्रह्मा के पास देव, मनुष्य और असुर ब्रह्मचर्य का पालन करके, क्रमशः पहुँचे । ब्रह्मचर्य का पालन करके देव लोग बोले कि पितामह ! हमें अब क्या आह्वा होती है ? इस पर पितामह ने उन्हें ' द ' अक्षर का उपदेश किया । मनुष्यों और असुरों को एक एक कर पास आने पर भी, इसी अक्षर का उपदेश दिया ।
सात्विक, राजस और तामस गुण-प्रधान—तीन प्रकार की सृष्टि हुई । सात्विक पुरुष 'देव' राजस 'मनुष्य' और तामस 'असुर' कहलाये । जो ब्रह्मचर्य का उत्तम पालन करते थे, देव माने गये, जो ब्रह्मचर्य का पालन भी करते थे और यथासमय सृष्टि करते थे, वे मनुष्य कहे गये, और जो इन्द्रिय-लोलुप, मदिरा-मांस-भक्षी तथा व्यभिचारी थे, वे असुर कहलाते थे । ब्रह्माजी ने त्रिविध प्रजा को ब्रह्मचर्य-पूर्वक रह कर, इन्द्रिय-दमन, दान और दया का ' द ' अक्षर कह कर उपदेश दिया ।
अब पाठक भली भाँति ब्रह्मचर्य की सृष्टि-कालीन-महत्ता और प्राचीनता के विषय में सन्तुष्ट हो गये होंगे ।
१६—ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल
पाठक गण, इस ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में अथर्ववेदीय ब्रह्मचर्य-सूक्त को, पढ़ ही चुके होंगे । आर्य-साहित्य में कहीं भी, ब्रह्मचर्य
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का इतना भावमय और व्यापक वर्णन खोजे से नहीं मिल सकता। यह सूक्त वैदिक सभ्यता के सर्वोच्चगुण का परिचायक है। इसमें विद्यार्थी, आचार्य, देव, राजा, प्रजाजन, कन्या, पशु-पक्षी-शृंग, सस्य, दिशा, ऋतु, रात-दिन, सन्मत, मेघ, औषधि और वनस्पतियाँ—सब में ब्रह्मचर्य की उद्भावना की गई है। यहाँ तक कि पृथ्वी से लेकर आकाश तक के सभी जीवों को ब्रह्मचारी कहा गया है। इस प्रकार एक आदर्श ब्रह्मचर्य के वायुमण्डल का रूप खड़ा कर दिया गया है। इस प्रकार के वर्णन से हमें दो अभिप्राय सूचित होते हैं। वे ये हैं:—
(१) यह सारी सृष्टि ब्रह्मचर्य के ही प्रताप से चल रही है। जिस कारण में, इसके ब्रह्मचर्य का नाश होगा, वह भी नष्ट हो जायगी। अर्थात् ब्रह्मचर्य ही अस्तित्व है।
(२) और जब यह वात है, तब तो मनुष्य का एक प्रकार से कर्तव्य हो जाता है कि वह ब्रह्मचर्य-पालन से अपनी जाति के अस्तित्व की रक्षा करे। यही ईश्वरीय आज्ञा भी है।
यहाँ एक प्रधान कारण था कि मनुष्य-जाति के कल्याण के लिये ऋषि-मुनि जन्म भर ब्रह्मचर्य-तपस्या करते थे। भितान्त आवर्य-कृता होने पर ही प्रजा की सृष्टि करते रहे। प्रयाग, हरद्वार तथा नैभिपारस्य जैसे तीर्थ-स्थानों पर ८८००० जन-संख्या की बृहत् धर्म-सभा में सदाचार और ब्रह्मचर्य पर विचार करते थे। 'ब्रह्मचर्य-रक्षा' के लिये ही नाना प्रकार की कथा-वाचों, ज्ञान-चर्चा और धर्म-शिक्षा होती थी। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे ऋषि-मुनि इस तत्व को भली भाँति जानते थे। और उनका भी उद्देश्य देश में ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल बनाना था। क्योंकि यह उनकी
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ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत
दृष्टि में सर्वोच्च धर्म था । और इसी के लिये प्राणपण से विविध सदुपायों से उपयोग करते थे ।
१७—ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत
इस खण्ड का यह अन्तिम लेख है । इसमें हमें जहाँ तक अब तक ब्रह्मचर्य पर प्राचीन ग्रंथों में प्रमाण मिल सके हैं, उन्हीं देते हैं, इन पर ध्यान देने से विशेष कल्याण की सम्भावना है—
“मनुष्य विना ब्रह्मचर्य धारण किये हुये, कदापि पूर्ण आयु वाले नहीं हो सकते ।”
( मगवात् ऋग्वेद )
“चारों आश्रमों के यथावत् पूर्ण होने ( पालन ) के लिये, ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करना चाहिये ।”
( मगवात् यजुर्वेद )
“विद्वान् मनुष्यों को योग्य है कि संसार में दो कार्य निरन्तर करें—(१) ब्रह्मचर्य तथा जितेन्द्रियत्व की शिक्षा से शरीर को नोरोग, वलिष्ठ और दीर्घजीवी बनावें और (२) सुविद्या और क्रियाकुशलता से आत्मा को तेजस्वी बनावें, जिससे सर्वदा आनन्द प्राप्त हो ।”
जैसे प्रसिद्ध अग्नि, विज्ञानी, जठराग्नि और बह्वाग्नि—ये चार और प्राण, इन्द्रिय तथा गो आदि पशु—सब जगत् की पुष्टि करते हैं, वैसे ही मनुष्यों को ब्रह्मचर्य आदि से अपना तथा दूसरों का बल बढ़ाना चाहिये । जो मनुष्य ब्रह्मचर्य, औषधपध्दः
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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तथा सुन्दर-नियमों के सेवन से शरीर की रक्षा करें, वो उनके भङ्ग दृढ़ होते हैं ।”
( भगवान् बख्खुवंद )
“सब पुराणों, प्राचीन संस्क्रुति और धर्मकी रक्षा, ब्रह्मचर्य-व्रत से होती है ।”
( भगवान् अथर्ववेद )
“ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम तप है । अखण्ड ब्रह्मचर्य-व्रत का व्रती पुरुष देवता है, उसे मनुष्य न समझना चाहिये ।”
( भगवान् शंकर )
“ब्रह्मचर ! ब्रह्मचारी पुरुष तुम्हें परम प्रिय जान पड़ता है । ब्रह्मचर्य से ही मेरा निर्भय पद प्राप्त हो सकता है ।”
( वैकुण्ठनाथ विष्णु )
“देव, मनुष्य और असुर—सब के लिये ब्रह्मचर्य अमृत-रूप है । जो वर-दान चाहे, वह ब्रह्म-निष्ठा से प्राप्त हो सकता है ।”
( वितामह ब्रह्मा )
“ब्रह्मचर्य से ब्रह्मतेज का सन्ध्य होता है । पूर्ण तपस्वी अपने तप का इसी के वल पर साधु सकता है । जो अपत्या महर्षि, वैद्यामित्र का तपोभङ्ग कर, तुम्हें निर्भय करेगी, उसे मेरा सदा सम्मान प्राप्त होगा ।”
( देवराज इन्द्र )
“हे जाव ! ब्रह्मचर्य रूपी सुधानिधि तेरे पास है । उसकी प्रतिष्ठा से अमर वन ! निराशा मत हो ! मनुष्यता को सार्थक बनाने का उद्योग कर !”
( भगवती श्रुति )
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ब्रह्मचर्यं परं प्राचीनं मतम्
“ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुये, वेदादि शास्त्रों का अध्ययन योग्य है। अधिकारी पुरुष ही अपनी सम्पत्ति की रक्षा कर सकता है।”
( महर्षि ऋगिरा )
“हे निष्पाप ! ब्रह्मचर्य से ही संसार की स्थिति है। मूलाधार के नष्ट होने पर ही पदार्थ का नाश होता है। अन्यथा नहीं !”
( महर्षि वशिष्ठ )
“ब्रह्मचर्य का पालन ब्रह्मपद का मूल है। जो अक्षय-पुण्य को पाना चाहता है, वह निष्ठा से जीवन व्यतीत करे।”
( देवर्षि नारद )
“शुनियर ! तुम्हारा शाप अस्वीकार करता हूँ। विवाह करने से तुम्हारा ब्रह्मचर्य-व्रत खण्डित हो जाता और लोक-कल्याण में बाधा उपस्थित होती। इसलिये माया करनी पड़ी।”
( मशान विष्णु )
“भोक्त का दृढ़ सोपान ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य-श्रम के सुधरने से सब क्रियायें सफल होती हैं।”
( महाशुनि दक्ष )
“ब्रह्मचर्य से ही ब्रह्मस्वरूप के दर्शन होते हैं। हे प्रभो ! निष्कामता ही प्रदान कर दास को कृतार्थ करे !”
( शुनियर्य आप्रद्वज )
“ब्रह्मचर्य से संतुल्य दिव्यता को प्राप्त होता है। शरीर के त्यागने पर सद्गति मिलती है।”
( शुनीन्द्र गर्ग )