भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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जैसे परम पद का लाभ हो सकता है, उसकी महिमा किससे गाई जा सकती है ?

१५—सृष्टि के आदि में ब्रह्मचर्य

पाठकों के मन में यह शङ्का उठनी स्वाभाविक है कि क्या सृष्टि के प्रारम्भ में भी ब्रह्मचर्य की मर्यादा स्थिर थी ? इसका समाधान हम श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के कथानक से करेंगे । वह इस प्रकार है:—

सनकश्च सनन्द्यश्च, सनातनमथात्मभूः । सनत्कुमारश्च मुनीन्निष्क्रियानुष्वरेतसः ॥

पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि-रचना के विचार से सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के मुनि-वृत्तिधारी ब्रह्मचारी चार पुत्रों को उत्पन्न किया ।

तान्बभाषे स्वभूः पुत्रान्प्रजाः सृजत पुत्रकाः । ते नैच्छन् भोज-धर्माणि, वासुदेव-परायणाः ॥

ब्रह्मा ने उन पुत्रों से कहा कि पुत्रो ! तुम लोग प्रजा की सृष्टि करो ! पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया । क्यों कि वे ब्रह्मचारी और परमात्मा के भक्त थे ।

उन पुत्रों ने प्रजा उत्पन्न करने से अस्वीकार क्यों किया ? इसका कारण यह था कि वे सालिक पुरुष थे; उन्होंने इस ब्रह्मचर्य की महत्ता दिखलाने के लिये ऐसा सत्कार्य किया ।