ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 132, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें१२९
[ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व]
वन तपस्या करते हैं, यदि उनकी साधना पूरी हुई, तो इस पद के अधिकारी होते हैं। इस ब्रह्म-पद का प्राप्त करना परम कठिन है। केनोपनिषद् में लिखा है:—
न तत्र चतुर्गच्छति नवामगच्छति न मनो न विश्वः । न तो वर्हो तत्क टष्टि पहुँचती है, न चाणी जा सकती है और न मन ही पहुँच सकता है। हम उसे जानते भी नहीं।
सर्वं !वेदा यत्पदमात्मनस्ति ।
तर्पासि सर्वाणि च यद्बदन्ति ॥
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ।
ततोपदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
( कठोपनिषद् )
सब वेद जिस पद का चिन्तन करते हैं। सब तप भी जिस-को बताते हैं और जिसके चाहने वाले ब्रह्मचर्य-प्राप्त का पालन करते हैं, उस पद को संक्षेप में कहते हैं।
ईश्वर-प्राप्ति के लिये वेद, तप और ब्रह्मचर्य, ये तीन साधन हैं। वेद और तप दोनों ब्रह्मचर्य के बिना सिद्ध नहीं हो सकते। इसलिये ब्रह्मचर्य को ही प्रधानता है। एक ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत वेद और तप दोनों की साधनार्थ विद्यमान हैं। बड़े-बड़े वेदाध्यायी और भारी-भारी तपस्वी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही अपने पद से च्युत हो जाते हैं। अतएव ईश्वर प्राप्त करने के लिये भी ब्रह्मचर्य सब से बड़ा साधन है। बिना ब्रह्मचर्य के ब्रह्मपद छुआय ही नहीं, अपितु नितान्त असम्भव है !
अब पाठक समझ गये होंगे कि ईश्वर-प्राप्ति के लिये भी ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। जिसके पालन से ईश्वर