ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 131, कुल 380 में से
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होता है। यही उसकी सच्ची मुक्ति है। सुयोग्य पुत्र विना ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन किये, किसी को किसी प्रकार, प्राप्त नहीं हो सकता। न्यभिचारी का शुक्र-सम्भूत पुत्र, सुयोग्य नहीं हो सकता।
अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले पुरुषों का पुत्र वत्स्य करने की शक्तियों में भाग्य नहीं है। वे मनसा, वाचा तथा कर्मणा संसार की सेवा करते हैं। उनकी शिक्षाओं तथा उद्योग से अनेक बालक सज्जन और सदाचारी बनकर, अपने छुट्पुत्र को यशस्वी बनाते हैं। उनके प्रताप से बहुत से विद्यार्थी अपना जीवन-सुधार कर पितरों को नरक में पड़ने से मुक्त करते हैं। फिर ऐसे पुरुष, जिनके कारण से, अन्य लोग स्वर्ग के अधिकारी बन जाते हैं, वे क्यों न मुक्ति प्राप्त करें !
सुना जाता है कि पारस प्रस्तर के दर्शनों से लोह भी सुवर्ण हो जाता है। अखण्ड ब्रह्मचारी भी उसी पारस के समान है; जिसके संसर्ग से अनोध बालक भी सुवर्ण के समान गुणवान और मूल्यवान बन जाता है। लोहे को सोना बनने की आवश्यकता होती है, पारस को नहीं। जो मुक्त नहीं है, उसे ही मुक्ति की आवश्यकता होती है, ब्रह्मचारी को नहीं। वह तो स्वयं मुक्त है।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मचर्य मुक्ति और स्वर्ग का भी एक मात्र साधन है। जब तक ब्रह्मचर्य सिद्ध नहीं होता, तब तक मुक्ति भी नहीं प्राप्त हो सकती।
मुक्ति तो ब्रह्मचारी पुरुष की दासी बनी रहती है। वे इसकी चिन्ता ही नहीं करते। उनके लिये यह चुच्छ है !
मुक्ति से-बदकर ईशान्य माना गया है। मुक्तों को भी ईशान्य की लालसा लगी रहती है। अनेक योगीजन जिसके लिये आजी-