भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व

१४—ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व

“अपुत्रस्य गतिनांरिते, स्वर्गं नैव च नैव च ।”

( सक्ति )

पुत्र-रहित पुरुष की मुक्ति नहीं होती । उसके लिये स्वर्ग का मिलना तो अत्यन्त असम्भव बात है ।

“स्वर्गे गच्छन्ति ते सर्वे, ये केचिद् ब्रह्मचारिणः ।”

( सक्ति )

संसार में जितने ब्रह्मचारी पुरुष हैं, वे सब स्वर्गमें जाते हैं ।

उपर के दोनों वचन शास्त्रीय हैं । पहले वचन का दूसरा अपवाद स्वरूप है । एक तो पुत्र के बिना मुक्तिही नहीं बतलाता, पर दूसरा कहता है कि बिना पुत्र के स्वर्ग तक मिल सकता है । जो लोग ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, वे विविध स्वर्ग प्राप्त करते हैं ।

यह बात है भी बहुत सत्य ! प्राचीन समय में बालखिल्व, नचिकेता, हनुमान तथा भीष्म आदि अनेक ब्रह्मचारियों ने पुत्र उत्पन्न नहीं किया, पर वे मुक्त हो गये । ऐसा क्यों ? क्योंकि उन्होंने अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन किया था ।

केवल पुत्र उत्पन्न करने से ही कोई पुरुष मोक्ष या स्वर्ग का अधिकारी नहीं बन बैठता । पुत्र के योग्य होने पर ही ऐसा हो सकता है । यदि पुत्र अयोग्य हुआ, तो अपने पितरों को नरक-नामी बना के ही छोड़ता है । सुयोग्य पुत्र के उत्पन्न होने से ही भगुज्य तीन ऋष्यों—ऋषि-ऋष्य, देव-ऋष्य और पितृ-ऋष्य ) से मुक्त

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