ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 129, कुल 380 में से
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ब्रह्मचर्य के पालन करने से निश्चय पूर्वक यह इच्छित ज्ञान-ज्ञान प्राप्त होता है ।
प्रश्नोपनिषद् में ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में एक बड़ा ही रोचक तथा सार गर्भित कथानक आया है। हम उसे यहाँ उद्धृत करते हैं:- कवन्धी और कात्यायन नाम के दो ऋषिकुमार थे । वे दोनों ब्रह्मचारी थे । एक दिन वे दोनों ही ऋषिवर पिप्पलाद के आश्रम में गये, और उनसे ब्रह्मज्ञान की शिक्षा देने के लिये निवेदन किया।
तान् ह स ऋषिरुवाच—भूय एव तपसा ब्रह्मचर्येण श्रद्धया सम्मत्सरे संवत्स्यय, यथाकामान् प्रश्नान् पुरुषेभ्य, यदि विज्ञानास्यामः सर्वं ह वो वक्ष्यामः ।
पिप्पलाद ने उन दोनों से कहा कि तुम दोनों एक वर्ष तक हमारे पास रह कर नियमानुसार श्रद्धापूर्वक ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करो । तत्पश्चात् जो प्रश्न चाहोगे, पूछ लेना । हम भी जो कुछ ज्ञान होगा, तुम लोगों को यथाशक्ति समझावेंगे ।
ऊपर के उदाहरण से यह बात जानी जाती है कि ब्रह्मज्ञान का अधिकारी ब्रह्मचारी ही पुरुष हो सकता है । पिप्पलाद जानते थे कि वे ऋषिकुमार ब्रह्मचारी हैं, पर ब्रह्मज्ञान के लिये उन्होंने उन दोनों से एक वर्ष तक विशेष रूप से ब्रह्मचर्य का पालन करवाया । उन्होंने समझा कि ब्रह्मचर्य के बिना ब्रह्मज्ञान का अनुभव नहीं किया जा सकता ।
अब पाठक समझ गये होंगे कि ब्रह्मज्ञान जैसे सद्बुद्धिष्व की योग्यता प्राप्त करने के लिये, ब्रह्मचारी रहना, कितना आवश्यक है ? जो पुरुष ब्रह्मज्ञान का लाभ करता चाहे, वह ब्रह्मचर्य का निश्चय रूप से पालन करे !