ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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[ब्रह्मचर्य से मुक्ति-ब्रह्मत्व]
वन तपस्या करते हैं, यदि उनकी साधना पूरी हुई, तो इस पद के अधिकारी होते हैं। इस ब्रह्म-पद का प्राप्त करना परम कठिन है। केनोपनिषद् में लिखा है:—
न तत्र चतुर्गच्छति नवामगच्छति न मनो न विश्वः । न तो वर्हो तत्क टष्टि पहुँचती है, न चाणी जा सकती है और न मन ही पहुँच सकता है। हम उसे जानते भी नहीं।
सर्वं !वेदा यत्पदमात्मनस्ति ।
तर्पासि सर्वाणि च यद्बदन्ति ॥
यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति ।
ततोपदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये ॥
( कठोपनिषद् )
सब वेद जिस पद का चिन्तन करते हैं। सब तप भी जिस-को बताते हैं और जिसके चाहने वाले ब्रह्मचर्य-प्राप्त का पालन करते हैं, उस पद को संक्षेप में कहते हैं।
ईश्वर-प्राप्ति के लिये वेद, तप और ब्रह्मचर्य, ये तीन साधन हैं। वेद और तप दोनों ब्रह्मचर्य के बिना सिद्ध नहीं हो सकते। इसलिये ब्रह्मचर्य को ही प्रधानता है। एक ब्रह्मचर्य के अन्तर्गत वेद और तप दोनों की साधनार्थ विद्यमान हैं। बड़े-बड़े वेदाध्यायी और भारी-भारी तपस्वी ब्रह्मचर्य से पतित होते ही अपने पद से च्युत हो जाते हैं। अतएव ईश्वर प्राप्त करने के लिये भी ब्रह्मचर्य सब से बड़ा साधन है। बिना ब्रह्मचर्य के ब्रह्मपद छुआय ही नहीं, अपितु नितान्त असम्भव है !
अब पाठक समझ गये होंगे कि ईश्वर-प्राप्ति के लिये भी ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है। जिसके पालन से ईश्वर
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जैसे परम पद का लाभ हो सकता है, उसकी महिमा किससे गाई जा सकती है ?
१५—सृष्टि के आदि में ब्रह्मचर्य
पाठकों के मन में यह शङ्का उठनी स्वाभाविक है कि क्या सृष्टि के प्रारम्भ में भी ब्रह्मचर्य की मर्यादा स्थिर थी ? इसका समाधान हम श्रीमद्भागवत के तृतीय स्कन्ध के कथानक से करेंगे । वह इस प्रकार है:—
सनकश्च सनन्द्यश्च, सनातनमथात्मभूः । सनत्कुमारश्च मुनीन्निष्क्रियानुष्वरेतसः ॥
पितामह ब्रह्मा ने सृष्टि-रचना के विचार से सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के मुनि-वृत्तिधारी ब्रह्मचारी चार पुत्रों को उत्पन्न किया ।
तान्बभाषे स्वभूः पुत्रान्प्रजाः सृजत पुत्रकाः । ते नैच्छन् भोज-धर्माणि, वासुदेव-परायणाः ॥
ब्रह्मा ने उन पुत्रों से कहा कि पुत्रो ! तुम लोग प्रजा की सृष्टि करो ! पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया । क्यों कि वे ब्रह्मचारी और परमात्मा के भक्त थे ।
उन पुत्रों ने प्रजा उत्पन्न करने से अस्वीकार क्यों किया ? इसका कारण यह था कि वे सालिक पुरुष थे; उन्होंने इस ब्रह्मचर्य की महत्ता दिखलाने के लिये ऐसा सत्कार्य किया ।
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ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल
प्रजापती पितरि ब्रह्मचर्यं मुमुक्षुंवा मनुष्या असुरा । उपित्त्य ब्रह्मचर्यं देवाःसुः प्रवीतु नो भवानिति तेष्यो हेत मन्त्र मुवाच द इति ॥
( शतपथ ब्राह्मण )
सृष्टि-रचना के अनन्तर पितामह ब्रह्मा के पास देव, मनुष्य और असुर ब्रह्मचर्य का पालन करके, क्रमशः पहुँचे । ब्रह्मचर्य का पालन करके देव लोग बोले कि पितामह ! हमें अब क्या आह्वा होती है ? इस पर पितामह ने उन्हें ' द ' अक्षर का उपदेश किया । मनुष्यों और असुरों को एक एक कर पास आने पर भी, इसी अक्षर का उपदेश दिया ।
सात्विक, राजस और तामस गुण-प्रधान—तीन प्रकार की सृष्टि हुई । सात्विक पुरुष 'देव' राजस 'मनुष्य' और तामस 'असुर' कहलाये । जो ब्रह्मचर्य का उत्तम पालन करते थे, देव माने गये, जो ब्रह्मचर्य का पालन भी करते थे और यथासमय सृष्टि करते थे, वे मनुष्य कहे गये, और जो इन्द्रिय-लोलुप, मदिरा-मांस-भक्षी तथा व्यभिचारी थे, वे असुर कहलाते थे । ब्रह्माजी ने त्रिविध प्रजा को ब्रह्मचर्य-पूर्वक रह कर, इन्द्रिय-दमन, दान और दया का ' द ' अक्षर कह कर उपदेश दिया ।
अब पाठक भली भाँति ब्रह्मचर्य की सृष्टि-कालीन-महत्ता और प्राचीनता के विषय में सन्तुष्ट हो गये होंगे ।
१६—ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल
पाठक गण, इस ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में अथर्ववेदीय ब्रह्मचर्य-सूक्त को, पढ़ ही चुके होंगे । आर्य-साहित्य में कहीं भी, ब्रह्मचर्य
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का इतना भावमय और व्यापक वर्णन खोजे से नहीं मिल सकता। यह सूक्त वैदिक सभ्यता के सर्वोच्चगुण का परिचायक है। इसमें विद्यार्थी, आचार्य, देव, राजा, प्रजाजन, कन्या, पशु-पक्षी-शृंग, सस्य, दिशा, ऋतु, रात-दिन, सन्मत, मेघ, औषधि और वनस्पतियाँ—सब में ब्रह्मचर्य की उद्भावना की गई है। यहाँ तक कि पृथ्वी से लेकर आकाश तक के सभी जीवों को ब्रह्मचारी कहा गया है। इस प्रकार एक आदर्श ब्रह्मचर्य के वायुमण्डल का रूप खड़ा कर दिया गया है। इस प्रकार के वर्णन से हमें दो अभिप्राय सूचित होते हैं। वे ये हैं:—
(१) यह सारी सृष्टि ब्रह्मचर्य के ही प्रताप से चल रही है। जिस कारण में, इसके ब्रह्मचर्य का नाश होगा, वह भी नष्ट हो जायगी। अर्थात् ब्रह्मचर्य ही अस्तित्व है।
(२) और जब यह वात है, तब तो मनुष्य का एक प्रकार से कर्तव्य हो जाता है कि वह ब्रह्मचर्य-पालन से अपनी जाति के अस्तित्व की रक्षा करे। यही ईश्वरीय आज्ञा भी है।
यहाँ एक प्रधान कारण था कि मनुष्य-जाति के कल्याण के लिये ऋषि-मुनि जन्म भर ब्रह्मचर्य-तपस्या करते थे। भितान्त आवर्य-कृता होने पर ही प्रजा की सृष्टि करते रहे। प्रयाग, हरद्वार तथा नैभिपारस्य जैसे तीर्थ-स्थानों पर ८८००० जन-संख्या की बृहत् धर्म-सभा में सदाचार और ब्रह्मचर्य पर विचार करते थे। 'ब्रह्मचर्य-रक्षा' के लिये ही नाना प्रकार की कथा-वाचों, ज्ञान-चर्चा और धर्म-शिक्षा होती थी। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे ऋषि-मुनि इस तत्व को भली भाँति जानते थे। और उनका भी उद्देश्य देश में ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल बनाना था। क्योंकि यह उनकी
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ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत
दृष्टि में सर्वोच्च धर्म था । और इसी के लिये प्राणपण से विविध सदुपायों से उपयोग करते थे ।
१७—ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत
इस खण्ड का यह अन्तिम लेख है । इसमें हमें जहाँ तक अब तक ब्रह्मचर्य पर प्राचीन ग्रंथों में प्रमाण मिल सके हैं, उन्हीं देते हैं, इन पर ध्यान देने से विशेष कल्याण की सम्भावना है—
“मनुष्य विना ब्रह्मचर्य धारण किये हुये, कदापि पूर्ण आयु वाले नहीं हो सकते ।”
( मगवात् ऋग्वेद )
“चारों आश्रमों के यथावत् पूर्ण होने ( पालन ) के लिये, ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करना चाहिये ।”
( मगवात् यजुर्वेद )
“विद्वान् मनुष्यों को योग्य है कि संसार में दो कार्य निरन्तर करें—(१) ब्रह्मचर्य तथा जितेन्द्रियत्व की शिक्षा से शरीर को नोरोग, वलिष्ठ और दीर्घजीवी बनावें और (२) सुविद्या और क्रियाकुशलता से आत्मा को तेजस्वी बनावें, जिससे सर्वदा आनन्द प्राप्त हो ।”
जैसे प्रसिद्ध अग्नि, विज्ञानी, जठराग्नि और बह्वाग्नि—ये चार और प्राण, इन्द्रिय तथा गो आदि पशु—सब जगत् की पुष्टि करते हैं, वैसे ही मनुष्यों को ब्रह्मचर्य आदि से अपना तथा दूसरों का बल बढ़ाना चाहिये । जो मनुष्य ब्रह्मचर्य, औषधपध्दः
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तथा सुन्दर-नियमों के सेवन से शरीर की रक्षा करें, वो उनके भङ्ग दृढ़ होते हैं ।”
( भगवान् बख्खुवंद )
“सब पुराणों, प्राचीन संस्क्रुति और धर्मकी रक्षा, ब्रह्मचर्य-व्रत से होती है ।”
( भगवान् अथर्ववेद )
“ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम तप है । अखण्ड ब्रह्मचर्य-व्रत का व्रती पुरुष देवता है, उसे मनुष्य न समझना चाहिये ।”
( भगवान् शंकर )
“ब्रह्मचर ! ब्रह्मचारी पुरुष तुम्हें परम प्रिय जान पड़ता है । ब्रह्मचर्य से ही मेरा निर्भय पद प्राप्त हो सकता है ।”
( वैकुण्ठनाथ विष्णु )
“देव, मनुष्य और असुर—सब के लिये ब्रह्मचर्य अमृत-रूप है । जो वर-दान चाहे, वह ब्रह्म-निष्ठा से प्राप्त हो सकता है ।”
( वितामह ब्रह्मा )
“ब्रह्मचर्य से ब्रह्मतेज का सन्ध्य होता है । पूर्ण तपस्वी अपने तप का इसी के वल पर साधु सकता है । जो अपत्या महर्षि, वैद्यामित्र का तपोभङ्ग कर, तुम्हें निर्भय करेगी, उसे मेरा सदा सम्मान प्राप्त होगा ।”
( देवराज इन्द्र )
“हे जाव ! ब्रह्मचर्य रूपी सुधानिधि तेरे पास है । उसकी प्रतिष्ठा से अमर वन ! निराशा मत हो ! मनुष्यता को सार्थक बनाने का उद्योग कर !”
( भगवती श्रुति )
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ब्रह्मचर्यं परं प्राचीनं मतम्
“ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुये, वेदादि शास्त्रों का अध्ययन योग्य है। अधिकारी पुरुष ही अपनी सम्पत्ति की रक्षा कर सकता है।”
( महर्षि ऋगिरा )
“हे निष्पाप ! ब्रह्मचर्य से ही संसार की स्थिति है। मूलाधार के नष्ट होने पर ही पदार्थ का नाश होता है। अन्यथा नहीं !”
( महर्षि वशिष्ठ )
“ब्रह्मचर्य का पालन ब्रह्मपद का मूल है। जो अक्षय-पुण्य को पाना चाहता है, वह निष्ठा से जीवन व्यतीत करे।”
( देवर्षि नारद )
“शुनियर ! तुम्हारा शाप अस्वीकार करता हूँ। विवाह करने से तुम्हारा ब्रह्मचर्य-व्रत खण्डित हो जाता और लोक-कल्याण में बाधा उपस्थित होती। इसलिये माया करनी पड़ी।”
( मशान विष्णु )
“भोक्त का दृढ़ सोपान ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य-श्रम के सुधरने से सब क्रियायें सफल होती हैं।”
( महाशुनि दक्ष )
“ब्रह्मचर्य से ही ब्रह्मस्वरूप के दर्शन होते हैं। हे प्रभो ! निष्कामता ही प्रदान कर दास को कृतार्थ करे !”
( शुनियर्य आप्रद्वज )
“ब्रह्मचर्य से संतुल्य दिव्यता को प्राप्त होता है। शरीर के त्यागने पर सद्गति मिलती है।”
( शुनीन्द्र गर्ग )
ब्रह्मचर्य-विचार्य
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“ब्रह्मचर्य के संरक्षण से मनुष्य को सब लाकों में सुख देने वाली सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं ।”
( मुनिराज क्षत्रि )
“जीवात्मा ब्रह्मचर्य से ही परमात्मा में लीन होता है । आस धर्म ही चारों फल की प्राप्ति का साधन है ।”
( महर्षि व्यास )
“ब्रह्मचर्य-व्रत के पालन से मनुष्य के अशुभ लक्षण भी नष्ट हो जाते हैं ।”
“जो उत्तम धर्म का पालन करता चाहे, वह इस संसार में ब्रह्मचर्य का पालन करे ।”
( पीयूषपाणि धन्वन्तरि )
“हे राजन् ! ब्रह्मचारी को कहीं भी दुःख नहीं होता । उसे सब कुछ प्राप्य है । ब्रह्मचर्य के प्रभाव से अनेक ऋषि ब्रह्मलोक में स्थित हैं ।”
( देवव्रत भीष्म )
“ब्रह्मचारी को सब कुछ सम्भव है । उत्साह से ही सब कार्य सिद्ध होते हैं । वे ही पुरुष-रत्न हैं, जो अपने व्रत का सदा पालन करते हैं ।”
( महावीर हनुमान )
“ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर, मनुष्य किसी भी आश्रम ( गृहस्थ, वाणप्रस्थ और सन्यास ) में प्रविष्ट हो सकता है ।”
( ऋषाश जाबाकि )
“ब्रह्मचर्य से ही ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की योग्यता प्राप्त होती है ।”
( ऋषिर विष्णुलाल )
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ब्रह्मचर्य पर प्रार्थीन मत
“ब्रह्मचारी रह कर नियमित रूप से अध्ययन करना चाहिये। विधि-रहित अध्ययन करने से खाध्याय का फल नहीं मिलता।”
(महामान्य हारीत)
“हे जनक जी ! जिसने ब्रह्मचर्य में चित्त की शुद्धि की है, उसी को अन्य आश्रमों (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) में आनन्द मिलता है।”
(बाल-ब्रह्मचारी बृहस्पति)
“विना ब्रह्मचर्य के (विषय-भोग से) आगुप्त्य, तेज, बल, वीर्य, बुद्धि, लक्ष्मी, महत्वाकांक्षा, पुरयतप और स्वामिमान का नाश हो जाता है।”
(स्मृतिकार गौतम मुनि)
“इच्छा से वीर्य का नाश करने वाला ब्रह्मचारी निश्चय पूर्वक अपने व्रत (ब्रह्मचर्य) का नाश कर देता है।”
(महामति मनु)
“ब्रह्मचर्य और अहिंसा शारीरिक तप है।”
(योगिराज कृष्ण)
“ब्रह्मचर्य के पालन से आत्मबल प्राप्त होता है।”
(शंगाचार्य पतञ्जलि)
“ब्रह्मचर्य के बल से ही मनुष्य ऋषि-लोक को जाता है।”
(कपिलमुनि)
“ब्रह्मचर्य-व्रत धारण करने वालों को मोक्ष (स्वर्गीय सुख) मिलता है।”
ते)
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“वीर्य ही सारे शरीर का सार है ।”
“मनुष्य का बल वीर्य के अधीन है ।”
“आज ही शरीर की धातुओं का तेज है ।”
( वैश्व )
“अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन कर लेने पर, सुलक्षण श्री से विवाह करना चाहिये ।”
( मिताक्षरा )
“जो मनुष्य ब्रह्मचारी नहीं उसको कभी सिद्धि नहीं होती । वह जन्म-मरणदि छेशों की बार-बार भोगता रहता है ।”
( अमृतासिद्ध )
“ब्रह्मचर्य से पाप इस प्रकार कटता है, जिस प्रकार सूर्योदय से अन्धकार का नाश होता है ।”
( धर्म-संमह )
ऊपर की सम्मलियाँ भावीन ग्रन्थों के श्लोकों के मर्म तथा कथानकों के अर्थ या भाव-रूप में संगृहीत की गयी हैं ।
तूतीष्य स्वण्यु
— ✤ ✤ ✤ —
१—ब्रह्म-चन्द्रना
ॐ त्वां हि मन्दतममर्कशोकैर्वृमहे महि नः श्रोच्यन्ते । इन्द्रं न त्वा श्वत्सा देवता वायुं प्रणन्ति राधसानृततमाः॥
( ऋग्वेद ४।१।६१ )
हे प्रकाशमान परमेश्वर ! तुम कोमल हृदय वाले हो । इस-लिये ब्रह्मचर्य-पूर्वक अध्ययन किये हुये, वीर्यशाली मन्त्रों से हम तुम्हारी आराधना करते हैं । तुम हमारी प्रार्थना को सुनो ! इन्द्र और वायु के समान तुम्हारी पूजा भी संसार में होती है ।
तुम इन्द्र और वायु की भाँति इसलिये पूजित हो कि संसार तुम्हारे बिना अपना जीवन-निर्वाह नहीं कर सकता । तुम्हारी कृपा से अमोघ पापों और दुष्कर्मियों का नाश होता है । ब्रह्मचारी लोग तुम्हारे तेज के लिये अपने व्रत से विचलित नहीं होते । तुम्हारे दिव्य गुणों से ही हमारा सदा कल्याण होता है । हम तुम्हारे ही द्वारा सुगन्धित पदार्थों को देवों तक भेज सकते हैं । हमको भी यही शक्ति दो, जिससे कि ब्रह्मचर्य से रह कर विश्व का उपकार करें । तुम्हारी कृपा से सब कुछ सम्भव है । तुम हमें भी श्रिय और निष्पाप बनाओ ! तुम से हमारी यही प्रार्थना है ।
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२—ब्रह्मचर्याश्रम
“ब्रह्मचर्याश्रमो ज्येष्ठः, श्रेष्ठश्चैव तथाविधम् ।” (वृत्ति)
ब्रह्मचर्याश्रम सब आश्रमों (गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास) से ज्येष्ठ और उसी प्रकार श्रेष्ठ भी है।
“स्वाध्ं यत्प्रथमे कमः, सुखाध्ं तत्तु सर्वदा ।” (नीति)
पहले पहल जो कार्य सिद्ध हो जाता है, वह सर्वदा सुखाध्य होता है।
ब्रह्मचर्याश्रम विद्यार्थी की वह अवस्था है, जिसमें वह प्रविष्ट होकर, नियमित समय तक वीर्य-रक्षा सहित विद्याभ्यसन करता है। इस आश्रम में प्रविष्ट होने पर, वह माता-पिता से दृष्ट्युक्त हो कर गुरु-कुल या ऋषि-कुल में वास करता है। आयुष्य का कम से कम प्रथम भाग उसे इसी संयमशील अवस्था में बिताना पड़ता है।
प्राचीन समय में यह आश्रम बड़ा महत्वशाली समझा जाता था। राजा-मन्त्रा सब के पुत्र यथासमय इस आश्रम के अधिकारी बनाये जाते थे। जब तक वे इस अवस्था को पार नहीं कर लेते थे, वे गृहस्थाश्रम के योग्य नहीं समझे जाते थे।
वतस्तोऽवस्थाः शरीरस्य दृढिर्द्यौवनं सम्पूरणं किञ्चित्पि दृणुमिच्छेति । आपोढयाहू वृद्धिः । आपञ्चक्षित्येत्यौवनं । आचत्वारिंशत्तः सम्पूरणं ततः किञ्चित्पिदृणुमिच्छेति ॥ (सुश्रुताचार्यः)
इस शरीर की चार अवस्थाएँ होती हैं। वृद्धि, यौवन, सम्पूरण और परिदृणु। १६ वें वर्ष से २५ वर्ष तक सब प्रायुषों की
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ब्रह्मचर्य युक्त अन्याश्रम
वृद्धि होती है। २५ वें वर्ष के पश्चात् ४० वें वर्ष तक सब धातुओं के पुष्ट हो जाने से जीवन प्राप्त होता है। ४० वें वर्ष के उपरान्त ( ६० वर्ष तक ) सम्पूर्णता रहती है। तत्पश्चात् हास्य आरम्भ हो जाता है।
यही कारण है कि कम से कम २५ वर्ष तक ब्रह्मचर्याश्रम का पालन किया जाता था। बहुत से विद्यार्थी इस आश्रम का महत्व समझ लेने पर, इससे अधिक समय तक या जीवन पर्यन्त इसी आश्रम में रहते थे।
३—ब्रह्मचर्य युक्त अन्याश्रम
ब्रह्मचर्य परि समाप्य गृही भवेत्।
गृहीभूत्वा वनी भवेत्। वनीभूत्वा प्रवजेत्।
( ब्रह्मज्ञ जावालि )
ब्रह्मचर्याश्रम का पालन कर लेने पर गृहस्थ बने। गृहस्थाश्रम का निर्वाह करके वनी हो। और वानप्रस्थाश्रम को समाप्त कर लेने पर सन्यासी बने।
“ब्रह्मचारी गृहीः वानप्रस्थो सिद्धिस्तुष्टये।”
( मनीषी अमर )
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी—ये चार आश्रमों के नाम हैं।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च, वानप्रस्थो यत्पितृत्था ।
पते गृहस्थ प्रभवच्छत्वारः पृथगाश्रमाः ॥
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यासी—ये पृथक्-पृथक् चार आश्रम गृहस्थ से उत्पन्न हुये हैं ।
मनुष्य की साधारण आयु १०० वर्षों की मानी गई है ! इस प्रकार इसके चार चरणों पर विभाग किये गये हैं । उन्हीं के अत्येक भाग को धर्म-शास्त्र के मत से आश्रम कहा जाता है ।
(१) ब्रह्मचर्याश्रम
उपनीतो माणवको, वसेद्गुरुकुलेषु च ।
गुरोः कुले प्रियं कुर्यात्कर्मणा मनसा गिरा ॥
( धर्मज्ञ हारीत )
उपनयन के हो जाने पर बालक को गुरुकुलों में जाकर रहना चाहिये । वहाँ मन, वचन और कर्म से गुरु के परिवार का हित करना चाहिये ।
पहला आश्रम ब्रह्मचर्याश्रम के नाम से पुकारा जाता है । व्रत-वन्ध करके पिता अपने पुत्र को किसी सुयोग्य आचार्य को समर्पित कर देता है । यहाँ वह बालक आयुष्य का पहला भाग ( २५ वर्षतक ) विद्याध्ययन, गुरु-सेवा और सदाचार-पालन में व्यतीत करता है । इतने काल में उसकी शारीरिक और मानसिक शक्तियाँ पूर्ण रूप से विकसित हो जाती हैं और वह गृहस्थाश्रम में आने के लिये योग्य बन जाता है ।
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गृहस्थाश्रम
( २ ) गृहस्थाश्रम
चतुर्थ मासुपो भागसुपित्त्वात् गृहैद्विजः । द्वितीय मासुपो भार्ग, छतदारो गृहचसेव ॥
( षोडीचार्यं मनु )
आयुष्य के चार विभाग का प्रथम भाग गुरुकुल में बिता कर, उसके द्वितीय भाग में विवाह कर गृहमें वास करे ।
दूसरा आश्रम गृहस्थाश्रम है । इसमें पहले आश्रम की सफलता देखलाई जाती है । इसका काल, आयुष्य का दूसरा भाग (२५ से ५०) तक है । गृहस्थ का अर्थ—गृह में रहने वाला होना है । इस आश्रम के कर्तव्य-कर्मों का भी नीचे उल्लेख किया जाता है:—
१—धर्म के साथ आजीविका के लिये धन एकत्र करना ।
२—सुपार्थों को दान दे कर संसार का हित करना ।
३—नित्य अपने घर में अभिहीन करना ।
४—पति-पत्नी में परस्पर प्रेम और सहकारिता का भाव रखना ।
५—बालकों का यथा योग्य पालन-पोषण करना तथा शिक्षा का प्रवन्ध करना ।
६—देव-पूजन, माता-पिता की सेवा, वेद का पठन-पाठन, जीवों को रक्षा और अतिथि-सत्कार करना ।
६—खरल और सदाचार युक्त जीवन व्यतीत करना ।
७—ईश्वर और धर्म पर विश्वास रख कर कार्य करना ।
अक्षरचर्य-विज्ञान
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८—अनाचारों से बचने के लिये सदैव नियम-पूर्वक रहना ।
९—सत्य, शील और सज्जता का परिचय देना ।
१०—परोपकार, दया, ज्ञान तथा उच्च विचारों में रत सदैव रहना ।
( ३ ) वान-प्रस्थाश्रम
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वली पलित मात्मनः । अपत्यस्यैवचापत्यं, तदारण्यसमाश्रयेत् ॥
( वर्माचार्य मञ्जु )
गृहस्थ जब अपने शरीर को शिथिल देखे और पुत्र को भी पुत्र हो जाय, तब वन में प्रवेश करे ।
तीसरा आश्रम वान-प्रस्थाश्रम कहलाता है । इस में पहले कहे हुये, दोनों आश्रमों से बिरक्ति होने लगती है । इसका समय आयुष्य का तीसरा भाग (५० से ७५ तक) है । वानप्रस्थ का अभिप्राय ही—वन में बसने वाला है । अब हम इस आश्रम के मूल कर्तव्यों का भी नीचे वर्णन करते हैं:—
१—वन में कुटी बना कर रहे और प्रकृति के तत्वों का निरीक्षण करे ।
२—संसार के कल्याण के लिये विद्यार्थियों को विद्या-दान दे ।
३—पशु-पक्षी आदि सब को प्रेम-की दृष्टि से देखे ।
४—फल, मूल आदि को खाकर अपना जीवन-निर्वाह करे ।
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सन्ध्यासाश्रम
५—नाना प्रकार की विद्याओं और विद्यानों का आविष्कार करे ।
६—सर्वदा संयम और सदाचार से अपने शरीर को शुद्ध और आत्मा को उन्नत बनावे ।
७—व्रत और हवन से अपने हृदय और बुद्धि को शान्त और तीव्र बनावे ।
८—धर्म-कर्म का आदेश गृहस्थों को भी देता रहे ।
९—इन्द्रिय-दमन और योगाभ्यास को हृदय करे ।
१०—परमात्मा के ध्यान और चिन्तन में मन को रसाता रहे ।
(४) सन्ध्यासाश्रम
वनेषु च विहृत्यैव, तृतीयं भागमाशुषः ।
चतुर्थमाशुपोभागं, त्वयस्त्वासङ्गपरिव्रजते ॥
(धर्माचार्य मनु )
इस प्रकार आशुष्य का तीसरा भाग वनों में वित्त कर उस के चौथे भाग में ( ७५ से १०० तक ) सब प्रकार के सन्ध्याओं को त्याग कर सन्ध्यासी हो जाय ।
चौथे आश्रम का नाम सन्ध्यासाश्रम है । यह अश्वितम आश्रम है । इस में पहले कहे गये तीनों आश्रमों के कर्मों का भी त्याग हो जाता है । सन्ध्यास का अर्थ है—सम्पूर्ण रीति से त्याग ।
इस आश्रम के प्रधान कर्तव्यों का वर्णन नीचे किया जाता है—
१—शरीर-रक्षा के लिये अल्प तथा सात्विक आहार करना ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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२—एक स्थान पर न रह कर देशाटन करना । ३—अपने पवित्र विचारों से संसार का हित करना और दोषों को दूर करना । ४—अपने मन को शुद्ध रख कर आचरण करना । ५—काम, क्रोध, लोभ, मोहादि विकारों से दूर रहना । ६—न जीने की इच्छा और न मरने का भय करना । ७—सत्य बात कहना और कभी मिथ्या का आश्रय न लेना । ८—प्राणि-मात्र पर दया रखना और सुख-दुःख को समान मानना ।
५—तृष्णाशील, शान्त, आत्मचिन्तक और ब्रह्मज्ञ बनना । १०—योगाभ्यास और द्वैधर-स्मरण में अपना समय श्रियाना ।
५—ब्रह्मचर्ययुक्त वर्ण-व्यवस्था
“चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं, गुण-कर्म-विभागशः ।”
( श्रीमद्भगवद्गीता )
चारों वर्णों की रचना, उनके गुण और कर्म के विभाग के अनुसार की गई है ।
ब्राह्मणोऽस्य सुखमास्तीदृ वाह्व राज्यन्यः कृतः ।
ऊरुतद्वस्थं यद् वैश्यः पद्भ्यो ५ शुद्धो अजायत ॥
( भगवद्गीता )
परम पुरुष के सुख से ब्राह्मण, बाहु से क्षत्रिय, ऊरु से वैश्य और पग से शुद्ध उत्पन्न हुए हैं । सारांश यह कि ज्ञान, बल, धन और सेवा-प्रधान, मनुष्य-जाति के चार विभाग बनाये गये ।
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ब्रह्मचर्ययुक्त वर्ण-व्यवस्था
१. ब्राह्मण
अध्यापन मध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रति ब्रह्महन्वेव, ब्राह्मणानामकल्पयत् ॥
( मनुस्मृति )
पढ़ना, पढ़ाना, यह करना, यह कराना, दान देना और दान लेना—ये ब्राह्मण के कर्म हैं । ११
शमो दमस्तपः शौचं, शान्तिराजं मेवच । ज्ञानं विज्ञानमस्तिदयं, ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ॥
( श्रीमंगवद्वर्णाता )
मन की शान्ति, इन्द्रियों का दमन, जितेन्द्रियता, पवित्रता, च्छमा-शीलता, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता—ये ब्राह्मण के स्वाभाविक गुण हैं ।
२. क्षत्रिय
प्रजानां रक्षणं दानमिज्याध्वनमेवच । विपयेष्व प्रसक्तिश्च, क्षत्रियस्य समासतः ॥
( मनुस्मृति )
प्रजा-रक्षण, दान देना, यह करना, अध्ययन करना, जितेन्द्रिय रहना—ये क्षत्रियों के संक्षिप्त कर्म हैं ।
शौर्यं तेजो धृतिर्दक्ष्यं, युद्धे चाप्यपलायनम् । दानमीश्वरभावश्च, ब्राह्म कर्म स्वभावजम् ॥
( श्रीमंगवद्वर्णाता )
शूरता, तेज, धैर्य, दक्षता, युद्ध में दृढ़ता, दान, और आस्तिकता—ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं ।
ब्रह्मचर्य-विज्ञान
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३. वैश्य
पशुनां रक्षणं दानं मिज्याध्ययनं मेवच । वशिष्कपथं कुत्सीदक्ष, वैश्यस्य क्विरेवच ॥
( मनुस्मृति )
पशुओं का संरक्षण, दान देना, यज्ञ करना, पढ़ना, व्यापार करना, और सूद लेना—ये वैश्य के कर्म हैं ।
४. शूद्र
एकमेव तु शूद्रस्य, प्रभुकर्मसमादिशत् । पतेपामेव वर्णानां, शुश्रूषा मनुसूयथा ॥
( मनुस्मृति )
शूद्र का एक ही कर्म निर्धारित किया गया है कि ऊपर कहे गये वर्णों की बहुत संयमशीलता से सेवा करते रहें ।
द्विजातियों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ) को तो उपनयन, ब्रह्मचर्य और वेदाध्ययन का प्रत्यक्ष रूप से अधिकार है । तीनों वर्णों के कर्म भी ऐसे हैं, जो बिना ब्रह्मचर्य पालन किये कदापि नहीं चल सकते । अब रहे शूद्र, यदि वे भी ब्रह्मचर्य से न रहें तो उन्हें भी सेवा कार्य का सुचारु-रूप से निर्वाह करना परम कठिन है । क्योंकि योगिवर भर्तृहरि का कहना है कि सेवा-धर्म अत्यन्त कठिन है, उसका पालन करना योगियों को भी दुर्लभ होता है ।
मनुष्य-शरीर में भी प्रकृति से चारों वर्णों की व्यवस्था की है। ज्ञान, बल, ऐश्वर्य और सेवा-कार्य के बिना एक क्षण भी इसकी स्थिति