ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें१३५
ब्रह्मचर्यं परं प्राचीनं मतम्
“ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुये, वेदादि शास्त्रों का अध्ययन योग्य है। अधिकारी पुरुष ही अपनी सम्पत्ति की रक्षा कर सकता है।”
( महर्षि ऋगिरा )
“हे निष्पाप ! ब्रह्मचर्य से ही संसार की स्थिति है। मूलाधार के नष्ट होने पर ही पदार्थ का नाश होता है। अन्यथा नहीं !”
( महर्षि वशिष्ठ )
“ब्रह्मचर्य का पालन ब्रह्मपद का मूल है। जो अक्षय-पुण्य को पाना चाहता है, वह निष्ठा से जीवन व्यतीत करे।”
( देवर्षि नारद )
“शुनियर ! तुम्हारा शाप अस्वीकार करता हूँ। विवाह करने से तुम्हारा ब्रह्मचर्य-व्रत खण्डित हो जाता और लोक-कल्याण में बाधा उपस्थित होती। इसलिये माया करनी पड़ी।”
( मशान विष्णु )
“भोक्त का दृढ़ सोपान ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य-श्रम के सुधरने से सब क्रियायें सफल होती हैं।”
( महाशुनि दक्ष )
“ब्रह्मचर्य से ही ब्रह्मस्वरूप के दर्शन होते हैं। हे प्रभो ! निष्कामता ही प्रदान कर दास को कृतार्थ करे !”
( शुनियर्य आप्रद्वज )
“ब्रह्मचर्य से संतुल्य दिव्यता को प्राप्त होता है। शरीर के त्यागने पर सद्गति मिलती है।”
( शुनीन्द्र गर्ग )