ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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तथा सुन्दर-नियमों के सेवन से शरीर की रक्षा करें, वो उनके भङ्ग दृढ़ होते हैं ।”
( भगवान् बख्खुवंद )
“सब पुराणों, प्राचीन संस्क्रुति और धर्मकी रक्षा, ब्रह्मचर्य-व्रत से होती है ।”
( भगवान् अथर्ववेद )
“ब्रह्मचर्य सर्वोत्तम तप है । अखण्ड ब्रह्मचर्य-व्रत का व्रती पुरुष देवता है, उसे मनुष्य न समझना चाहिये ।”
( भगवान् शंकर )
“ब्रह्मचर ! ब्रह्मचारी पुरुष तुम्हें परम प्रिय जान पड़ता है । ब्रह्मचर्य से ही मेरा निर्भय पद प्राप्त हो सकता है ।”
( वैकुण्ठनाथ विष्णु )
“देव, मनुष्य और असुर—सब के लिये ब्रह्मचर्य अमृत-रूप है । जो वर-दान चाहे, वह ब्रह्म-निष्ठा से प्राप्त हो सकता है ।”
( वितामह ब्रह्मा )
“ब्रह्मचर्य से ब्रह्मतेज का सन्ध्य होता है । पूर्ण तपस्वी अपने तप का इसी के वल पर साधु सकता है । जो अपत्या महर्षि, वैद्यामित्र का तपोभङ्ग कर, तुम्हें निर्भय करेगी, उसे मेरा सदा सम्मान प्राप्त होगा ।”
( देवराज इन्द्र )
“हे जाव ! ब्रह्मचर्य रूपी सुधानिधि तेरे पास है । उसकी प्रतिष्ठा से अमर वन ! निराशा मत हो ! मनुष्यता को सार्थक बनाने का उद्योग कर !”
( भगवती श्रुति )