भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत

दृष्टि में सर्वोच्च धर्म था । और इसी के लिये प्राणपण से विविध सदुपायों से उपयोग करते थे ।

१७—ब्रह्मचर्य पर प्राचीन मत

इस खण्ड का यह अन्तिम लेख है । इसमें हमें जहाँ तक अब तक ब्रह्मचर्य पर प्राचीन ग्रंथों में प्रमाण मिल सके हैं, उन्हीं देते हैं, इन पर ध्यान देने से विशेष कल्याण की सम्भावना है—

“मनुष्य विना ब्रह्मचर्य धारण किये हुये, कदापि पूर्ण आयु वाले नहीं हो सकते ।”

( मगवात् ऋग्वेद )

“चारों आश्रमों के यथावत् पूर्ण होने ( पालन ) के लिये, ब्रह्मचर्याश्रम का पालन करना चाहिये ।”

( मगवात् यजुर्वेद )

“विद्वान् मनुष्यों को योग्य है कि संसार में दो कार्य निरन्तर करें—(१) ब्रह्मचर्य तथा जितेन्द्रियत्व की शिक्षा से शरीर को नोरोग, वलिष्ठ और दीर्घजीवी बनावें और (२) सुविद्या और क्रियाकुशलता से आत्मा को तेजस्वी बनावें, जिससे सर्वदा आनन्द प्राप्त हो ।”

जैसे प्रसिद्ध अग्नि, विज्ञानी, जठराग्नि और बह्वाग्नि—ये चार और प्राण, इन्द्रिय तथा गो आदि पशु—सब जगत् की पुष्टि करते हैं, वैसे ही मनुष्यों को ब्रह्मचर्य आदि से अपना तथा दूसरों का बल बढ़ाना चाहिये । जो मनुष्य ब्रह्मचर्य, औषधपध्दः