ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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का इतना भावमय और व्यापक वर्णन खोजे से नहीं मिल सकता। यह सूक्त वैदिक सभ्यता के सर्वोच्चगुण का परिचायक है। इसमें विद्यार्थी, आचार्य, देव, राजा, प्रजाजन, कन्या, पशु-पक्षी-शृंग, सस्य, दिशा, ऋतु, रात-दिन, सन्मत, मेघ, औषधि और वनस्पतियाँ—सब में ब्रह्मचर्य की उद्भावना की गई है। यहाँ तक कि पृथ्वी से लेकर आकाश तक के सभी जीवों को ब्रह्मचारी कहा गया है। इस प्रकार एक आदर्श ब्रह्मचर्य के वायुमण्डल का रूप खड़ा कर दिया गया है। इस प्रकार के वर्णन से हमें दो अभिप्राय सूचित होते हैं। वे ये हैं:—
(१) यह सारी सृष्टि ब्रह्मचर्य के ही प्रताप से चल रही है। जिस कारण में, इसके ब्रह्मचर्य का नाश होगा, वह भी नष्ट हो जायगी। अर्थात् ब्रह्मचर्य ही अस्तित्व है।
(२) और जब यह वात है, तब तो मनुष्य का एक प्रकार से कर्तव्य हो जाता है कि वह ब्रह्मचर्य-पालन से अपनी जाति के अस्तित्व की रक्षा करे। यही ईश्वरीय आज्ञा भी है।
यहाँ एक प्रधान कारण था कि मनुष्य-जाति के कल्याण के लिये ऋषि-मुनि जन्म भर ब्रह्मचर्य-तपस्या करते थे। भितान्त आवर्य-कृता होने पर ही प्रजा की सृष्टि करते रहे। प्रयाग, हरद्वार तथा नैभिपारस्य जैसे तीर्थ-स्थानों पर ८८००० जन-संख्या की बृहत् धर्म-सभा में सदाचार और ब्रह्मचर्य पर विचार करते थे। 'ब्रह्मचर्य-रक्षा' के लिये ही नाना प्रकार की कथा-वाचों, ज्ञान-चर्चा और धर्म-शिक्षा होती थी। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे ऋषि-मुनि इस तत्व को भली भाँति जानते थे। और उनका भी उद्देश्य देश में ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल बनाना था। क्योंकि यह उनकी