ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 134, कुल 380 में से
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ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल
प्रजापती पितरि ब्रह्मचर्यं मुमुक्षुंवा मनुष्या असुरा । उपित्त्य ब्रह्मचर्यं देवाःसुः प्रवीतु नो भवानिति तेष्यो हेत मन्त्र मुवाच द इति ॥
( शतपथ ब्राह्मण )
सृष्टि-रचना के अनन्तर पितामह ब्रह्मा के पास देव, मनुष्य और असुर ब्रह्मचर्य का पालन करके, क्रमशः पहुँचे । ब्रह्मचर्य का पालन करके देव लोग बोले कि पितामह ! हमें अब क्या आह्वा होती है ? इस पर पितामह ने उन्हें ' द ' अक्षर का उपदेश किया । मनुष्यों और असुरों को एक एक कर पास आने पर भी, इसी अक्षर का उपदेश दिया ।
सात्विक, राजस और तामस गुण-प्रधान—तीन प्रकार की सृष्टि हुई । सात्विक पुरुष 'देव' राजस 'मनुष्य' और तामस 'असुर' कहलाये । जो ब्रह्मचर्य का उत्तम पालन करते थे, देव माने गये, जो ब्रह्मचर्य का पालन भी करते थे और यथासमय सृष्टि करते थे, वे मनुष्य कहे गये, और जो इन्द्रिय-लोलुप, मदिरा-मांस-भक्षी तथा व्यभिचारी थे, वे असुर कहलाते थे । ब्रह्माजी ने त्रिविध प्रजा को ब्रह्मचर्य-पूर्वक रह कर, इन्द्रिय-दमन, दान और दया का ' द ' अक्षर कह कर उपदेश दिया ।
अब पाठक भली भाँति ब्रह्मचर्य की सृष्टि-कालीन-महत्ता और प्राचीनता के विषय में सन्तुष्ट हो गये होंगे ।
१६—ब्रह्मचर्य का वायुमण्डल
पाठक गण, इस ग्रन्थ के प्रथम खण्ड में अथर्ववेदीय ब्रह्मचर्य-सूक्त को, पढ़ ही चुके होंगे । आर्य-साहित्य में कहीं भी, ब्रह्मचर्य